झरिया का इतिहास और झरिया के राजा: एक गौरवशाली अतीत की अनकही कहानी
झरिया (Jharia), जिसे आज मुख्य रूप से इसकी कोयला खदानों और वहां लगी आग के लिए जाना जाता है, का इतिहास बेहद पुराना और रहस्यमयी है। झारखंड राज्य के धनबाद जिले से मात्र 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह शहर, कभी राजा-महाराजाओं की रियासत हुआ करता था।
आइए विस्तार से जानते हैं झरिया का इतिहास और यहाँ के राजाओं की कहानी, जिसके बारे में आज भी बहुत कम लोग जानते हैं।
एक नज़र में झरिया का ऐतिहासिक महत्व
- स्थान: झरिया, धनबाद जिला, झारखंड
- धनबाद से दूरी: लगभग 8 किलोमीटर
- प्राचीन पहचान: राजा-महाराजाओं की रियासत
- प्रमुख ऐतिहासिक आकर्षण: राजाओं के प्राचीन किले और खंडहर
झरिया के राजा और उनका शाही शासन
भारत में अंग्रेजों के आगमन से बहुत पहले, झरिया पूरी तरह से राजशाही के अधीन था। यहाँ के राजाओं का अपना एक अलग प्रभाव और वर्चस्व हुआ करता था।
- स्वतंत्र रियासत: अंग्रेजों के शासन (British Rule) से पहले झरिया में केवल राजा-महाराजाओं का ही शासन चलता था। यहाँ की प्रजा और प्रशासन पूरी तरह से शाही दरबार के अधीन थे।
- आज भी मौजूद हैं वंशज: इतिहास के पन्नों में दर्ज झरिया के शाही परिवारों का अंत पूरी तरह से नहीं हुआ है। आपको जानकर हैरानी होगी कि उन राजघरानों के कुछ वंशज आज भी झरिया में निवास करते हैं, जो इस बात का जीता-जागता प्रमाण हैं कि यहाँ कभी एक समृद्ध रियासत हुआ करती थी।
🏰 अतीत की गवाही देते पुराने और जर्जर किले
यदि आप आज झरिया का दौरा करते हैं, तो आपको अतीत की कई ऐतिहासिक झलकियां देखने को मिलेंगी:
- खंडहर में तब्दील शाही किले: झरिया में आज भी अनगिनत ऐसे पुराने किले मौजूद हैं, जो समय के साथ जर्जर होकर खंडहर में बदल चुके हैं।
- इतिहास का आईना: इन किलों की भव्य संरचना को देखकर आप आसानी से यह अंदाजा लगा सकते हैं कि उस दौर में राजाओं का जीवन और उनका साम्राज्य कितना विशाल और समृद्ध रहा होगा। ये किले आज भी उस दौर की वास्तुकला को दर्शाते हैं।
ब्रिटिश काल और झरिया का बदलाव
जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत का विस्तार हुआ, तब झरिया के इतिहास ने एक नया मोड़ लिया। अंग्रेजों के आने के बाद यहाँ कोयले के विशाल भंडार की खोज हुई। इसके बाद, झरिया का स्वरूप एक राजशाही रियासत से बदलकर भारत के सबसे प्रमुख खनन और औद्योगिक क्षेत्र में तब्दील हो गया।

झरिया का इतिहास: 120 साल पहले झरिया पर किसका शासन था और कौन थे यहाँ के राजा?
झरिया (Jharia) की पहचान आज भले ही कोयला खदानों और आग के लिए होती है, लेकिन इसका अतीत बहुत गहरा और राजशाही से जुड़ा हुआ है। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें और देखें कि लगभग 120 साल पहले झरिया में किसका शासन था, तो हमें एक बेहद समृद्ध और शक्तिशाली रियासत की कहानी मिलती है।
🏛️ झरिया राज एस्टेट और ब्रिटिश कालीन प्रशासनिक ढांचा
ब्रिटिश भारत के दौर में ‘झरिया राज एस्टेट’ एक प्रमुख और विशाल ज़मींदारी रियासत (Zamindari State) हुआ करती थी। उस समय की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति आज से काफी अलग थी:
- बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा: 18वीं और 19वीं सदी में अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था और इसे भारत के सबसे बड़े ब्रिटिश प्रांत, ‘बंगाल प्रेसीडेंसी’ का हिस्सा बना दिया था।
- संयुक्त प्रांत: उस वक्त झरिया, बंगाल प्रांत के अधीन आने वाले बिहार प्रांत में स्थित था। तब बिहार और उड़ीसा ब्रिटिश भारत का एक ही संयुक्त प्रांत हुआ करते थे।
- प्रशासनिक विभाजन: 1 अप्रैल 1912 को एक बड़ा बदलाव हुआ, जब बिहार और उड़ीसा को पश्चिम बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग कर दिया गया। इसके बाद, 22 मार्च 1936 को बिहार और उड़ीसा को भी विभाजित कर दो अलग-अलग प्रांत बना दिए गए।
रीवा से झरिया तक: राज परिवार की जड़ें और रियासत की स्थापना
झरिया के राज परिवार का इतिहास केवल इसी क्षेत्र तक सीमित नहीं है। पारिवारिक इतिहास और उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार:
- मूल निवास: झरिया के ज़मींदार मूल रूप से मध्य भारत के रीवा (वर्तमान मध्य प्रदेश) के रहने वाले थे।
- रियासत की स्थापना: सन् 1763 में इस राज परिवार ने झरिया और उसके आसपास के क्षेत्रों में अपना राज्य स्थापित किया। अपने साम्राज्य का विस्तार करते हुए सन् 1864 में झरिया स्टेट ने ‘जयनगर’ की संपत्ति भी खरीद ली थी।
- रियासत का मुख्यालय: परंपरा के अनुसार, पहले झरिया राज का मुख्यालय कटरा गांव हुआ करता था। आज भी झरिया राज परिवार का पैतृक घर सह-किला कटरा (जम्मू कश्मीर) में स्थित है।
- साम्राज्य का विभाजन: समय के साथ यह विशाल रियासत कटरा, झरिया और नवागढ़ गांव (वर्तमान में छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले का हिस्सा) के अलग-अलग घरानों में विभाजित हो गई।
गौर करने वाली बात यह है कि राजशाही का दौर खत्म होने के बावजूद, आज भी इस शाही परिवार के कुछ वंशज झरिया में निवास करते हैं।
कोयले की खोज और झरिया का स्वर्णिम युग
सन् 1890 के दशक में जब झरिया के इस क्षेत्र में कोयले की खोज (Coal Discovery) हुई और खनन शुरू हुआ, तब इस रियासत की किस्मत पूरी तरह से बदल गई। यह बंगाल प्रेसीडेंसी के सबसे अमीर ज़मींदारी एस्टेट्स में से एक बन गया।
इस सुनहरे दौर में राजा दुर्गा प्रसाद सिंह का नाम सबसे प्रमुखता से आता है। उन्हें सन् 1850 के दशक में ही यह संपत्ति मिल गई थी, हालांकि उस वक्त वह नाबालिग थे। राजा दुर्गा प्रसाद सिंह के नेतृत्व में झरिया राज ने अपार धन और ख्याति अर्जित की। सन् 1916 में राजा दुर्गा प्रसाद सिंह का निधन हो गया।
झरिया के अंतिम राजा और ज़मींदारी प्रथा का अंत
राजा दुर्गा प्रसाद सिंह के बाद रियासत की बागडोर आगे बढ़ी। जनवरी 1947 में राजा शिव प्रसाद का निधन हो गया।
उनके निधन के बाद उनके सबसे बड़े पुत्र, श्री काली प्रसाद सिंह ने राजगद्दी संभाली और वे झरिया के अंतिम राजा बने। उनका यह प्रतीकात्मक शासन तब तक चला जब तक कि आज़ाद भारत में सन् 1952 में सरकार द्वारा ‘ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम’ के तहत ज़मींदारी प्रथा को पूरी तरह से समाप्त नहीं कर दिया गया।
झरिया में कोयले का इतिहास: सर्वे, पहली लीज और रेलवे क्रांति की पूरी कहानी
झरिया का इतिहास जितना शाही रहा है, उतना ही दिलचस्प यहाँ कोयले के काले सोने (Black Gold) में तब्दील होने का सफर भी है। दामोदर और बराकर नदियों की गोद में बसे इस क्षेत्र ने भारत के औद्योगिक विकास की नींव रखी। आइए जानते हैं कि झरिया में कोयला खनन की शुरुआत कैसे हुई और इसके पीछे क्या इतिहास है।
🗺️ मानभूम जिला और 5 बड़ी रियासतें
आज हम जिसे धनबाद जिला कहते हैं, वह कभी ‘मानभूम जिला’ के अंतर्गत आता था। दामोदर और बराकर नदियों के बीच फैले इस प्रमुख कोयला खनन क्षेत्र में पाँच बड़ी रियासतों (Estates) का दबदबा हुआ करता था:
- झरिया राज
- नवागढ़ राज
- कतरासगढ़ राज
- टुंडी राज
- पांडरा राज
🔬 कोयले का पहला वैज्ञानिक सर्वे और बड़ा खुलासा
झरिया के गर्भ में छिपे कोयले के विशाल भंडार को दुनिया के सामने लाने में भूवैज्ञानिकों (Geologists) की बड़ी भूमिका रही:
- पहला आधिकारिक सर्वे (1866): इस पूरे क्षेत्र का सबसे पहला भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण टी. डब्ल्यू. एच. ह्यूजेस (T.W.H. Hughes) द्वारा सन् 1866 में किया गया था।
- टी. एच. वार्ड का अनुमान (1890): इसके बाद सन् 1890 में टी. एच. वार्ड (T.H. Ward) ने इस क्षेत्र का दोबारा गहन अध्ययन किया। उन्होंने अनुमान लगाया कि यहाँ लगभग 850 मिलियन टन उच्च गुणवत्ता (Good Quality) वाला कोयला रिजर्व मौजूद है। इस खुलासे ने ब्रिटिश सरकार और बड़ी कंपनियों के कान खड़े कर दिए।
कोर्ट ऑफ वार्ड्स और पहली कोल माइंस लीज (पट्टा) का संघर्ष
झरिया में खनन शुरू करना इतना आसान नहीं था। जमीन और कानूनी दांव-पेंच के कारण कंपनियों को लंबा इंतजार करना पड़ा:
- 1858 का पहला आवेदन: सन् 1858 में ही मेसर्स बोरोदेल एंड कंपनी (M/s Borradaile & Company) ने पूरे झरिया स्टेट में कोयला खनन के पट्टे (Lease) के लिए आवेदन किया था।
- कोर्ट ऑफ वार्ड्स की अड़चन: उस वक्त झरिया स्टेट की संपत्तियां ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्स’ (Court of Wards) के नियंत्रण में थीं, जिसके नियमों के कारण खदान के लिए आसानी से मंजूरी नहीं मिलती थी। यही वजह रही कि सन् 1890 से पहले यहाँ खनन के लिए कोई भी आधिकारिक पट्टा (Lease) मंजूर नहीं किया जा सका।
1895 की रेलवे क्रांति और गुजरातियों का आगमन
झरिया के कोयला उद्योग को असल रफ्तार तब मिली जब यहाँ परिवहन (Transportation) के साधनों का विकास हुआ:
कच्छी और गुजराती ठेकेदारों का आगमन: रेलवे निर्माण के इस दौर में ठाणे (महाराष्ट्र) में रेलवे लाइन बिछाने का अच्छा अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ गुजराती और कच्छी ठेकेदार भी भारी संख्या में झरिया पहुंचे। उन्होंने न सिर्फ रेलवे लाइनों के निर्माण में मदद की, बल्कि आगे चलकर यहाँ के कोयला व्यवसाय में भी अपनी एक अमिट छाप छोड़ी।
रेलवे लाइनों का जाल (1895): सन् 1895 में एक ऐतिहासिक बदलाव हुआ जब धनबाद, झरिया, कतरास, कुसुंडा और पाथरडीह को रेलवे लाइनों के जरिए सीधे आसनसोल से होते हुए कलकत्ता (अब कोलकाता) से जोड़ दिया गया।
खनन उद्योग में उछाल: रेलवे कनेक्टिविटी मिलते ही यहाँ से कोयले को देश के दूसरे हिस्सों और बंदरगाहों तक भेजना आसान हो गया, जिससे खनन उद्योग का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ।
झरिया से कितना कोयला निकलता है: इतिहास से लेकर वर्तमान की चुनौतियाँ और बंद खदानों का सच
झरिया के कोयला क्षेत्र का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, वर्तमान में इसके सामने उतनी ही बड़ी चुनौतियाँ भी हैं। एक समय भारत की औद्योगिक क्रांति की रीढ़ रहा झरिया आज अपनी बंद पड़ी खदानों और नए सिरे से उत्खनन (Excavation) की योजनाओं के बीच खड़ा है। आइए जानते हैं झरिया के कोयला उत्पादन का पूरा समीकरण।
💧 बंद खदानें और विस्थापन की नई योजनाएं
आज झरिया में कोयला उत्पादन के सामने कई बड़ी व्यावहारिक दिक्कतें हैं, जिसके कारण कई इलाकों में काम रुका हुआ है:
- खदानों में पानी भरना: झरिया की कई महत्वपूर्ण कोयला खदानें पिछले कई सालों से बंद पड़ी हैं। इसका मुख्य कारण खदानों के भीतर भारी मात्रा में पानी घुस जाना है, जिससे कोयले का उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया।
- नए क्षेत्रों में खुदाई की प्लानिंग: बंद खदानों के विकल्प के रूप में अब उसके आसपास के नए इलाकों से खुदाई करके कोयला निकालने की बड़ी योजना बनाई जा रही है।
- विस्थापन की चुनौती: इस नई माइनिंग प्लानिंग के कारण प्रशासन और कंपनियों द्वारा उन इलाकों से स्थानीय आबादी को हटाने और उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट करने (पुनर्वास) की कोशिशें लगातार चल रही हैं, जो कि एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।
👑 तत्कालीन राजा से पट्टा और भारतीय खनिक ‘खोरा रामजी’ का उदय
19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में जब झरिया में कोयले की चमक बढ़ी, तो कई दूरदर्शी व्यवसायी यहाँ पहुंचे:
- राजा से खरीदी ज़मीन: शुरुआती उद्यमियों ने झरिया के तत्कालीन राजा से मुलाकात की और उन जमीनों को पट्टे (Lease) पर लिया या खरीदा, जहाँ भूवैज्ञानिकों ने प्रचुर मात्रा में कोयला होने का अनुमान लगाया था।
- अग्रणी भारतीय खनिक ‘खोरा रामजी’: इस पूरे दौर में अंग्रेजों के वर्चस्व के बीच एक भारतीय नाम सबसे तेजी से उभरा—खोरा रामजी (Khora Ramji)। वे झरिया के अग्रणी कोयला खदान मालिकों में से एक थे, जिनकी सफलता और योगदान को खुद ब्रिटिश राजपत्रकर्ताओं (British Gazetteers) ने भी आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया था।
झरिया राज की समृद्धि और व्यापारिक हब बनना
सन् 1900 की शुरुआत होते-होते झरिया पूरी तरह से बदल चुका था:
- ट्रेन लिंक के जरिए कलकत्ता से सीधे जुड़ने के कारण यहाँ दर्जनों कोयला खदानें दिन-रात चलने लगीं।
- बाहरी और प्रवासी आबादी के आने से झरिया एक बड़ा व्यावसायिक हब बन गया।
- खदानों से मिलने वाली भारी रॉयल्टी (Royalty) ने झरिया राज को उस दौर के सबसे अमीर घरानों की सूची में शामिल कर दिया।
झरिया बनाम रानीगंज: जब देश का 50% कोयला अकेले झरिया से निकलता था
उस दौर में रानीगंज (पश्चिम बंगाल) और झरिया कोयला क्षेत्र के खदान मालिकों के बीच व्यापार में भारी प्रतिस्पर्धा (Competition) चलती थी। इस मुकाबले में झरिया ने जो मुकाम हासिल किया, वह आज भी एक रिकॉर्ड है:
- 50% का ऐतिहासिक योगदान: अपनी बेहतरीन क्वालिटी के दम पर सन् 1907 तक भारत के कुल कोयला उत्पादन में अकेले झरिया का योगदान 50% तक पहुँच गया था। यानी देश का आधा कोयला सिर्फ झरिया की धरती उगल रही थी।
- ‘खास झरिया कोलिएरी’ का इतिहास: खोरा रामजी के स्वामित्व वाली ‘खास झरिया कोलिएरी’ (Khas Jharia Colliery) इस क्षेत्र की सबसे पुरानी और ऐतिहासिक खानों में से एक है, जो आज भी मौजूद है।
वर्तमान स्थिति: खास झरिया कोलिएरी वाले इलाके में आज भी लोग रहते हैं, लेकिन फिलहाल वहाँ कोयले का उत्पादन बंद है। हालांकि, अब इस पूरे क्षेत्र में नए सिरे से ओपन-कास्ट माइनिंग (खुदाई) करके कोयला निकालने की बातें चल रही हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले कुछ सालों में यहाँ फिर से भारी पैमाने पर खुदाई शुरू की जा सकती है।
पहले झरिया किस क्षेत्र में आता था? मानभूम से धनबाद बनने की पूरी कहानी
झरिया का भौगोलिक और प्रशासनिक इतिहास बड़ा ही दिलचस्प रहा है। आज हम जिस क्षेत्र को धनबाद जिले के सबसे प्रमुख हिस्से के रूप में देखते हैं, अंग्रेजी हुकूमत के दौर में उसकी पहचान और प्रशासनिक सीमाएं बिल्कुल अलग हुआ करती थीं।
आइए जानते हैं कि पहले झरिया किस क्षेत्र के अंतर्गत आता था और इसका मुख्यालय कहाँ था।
मानभूम जिला और बदलता मुख्यालय: बंगसोर्ना से गोविंदपुर का सफर
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, झरिया राज पहले ‘मानभूम जिले’ (Manbhum District) का एक अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। उस दौर में प्रशासनिक सहूलियत के हिसाब से इसके मुख्यालयों में कई बदलाव किए गए:
- बंगसोर्ना मुख्यालय: शुरुआती दौर में इस पूरे क्षेत्र के प्रशासनिक कामकाज का मुख्य केंद्र या मुख्यालय ‘बंगसोर्ना’ हुआ करता था।
- गोविंदपुर में स्थानांतरण: प्रशासनिक व्यवस्था को और बेहतर बनाने के उद्देश्य से बाद में इस मुख्यालय को बंगसोर्ना से हटाकर ‘गोविंदपुर’ में स्थानांतरित (Transfer) कर दिया गया था।
📜 सर एंड्रयू फ्रेजर का फैसला और धनबाद का उदय (1904 – 1908)
19वीं सदी के अंत में झरिया कोयला क्षेत्र में रेलवे के आने और माइनिंग उद्योग के तेजी से पैर पसारने के बाद, ब्रिटिश सरकार को यहाँ एक बड़े प्रशासनिक बदलाव की जरूरत महसूस हुई:
- 1904 का ऐतिहासिक निर्णय: सन् 1904 में बंगाल के तत्कालीन उपराज्यपाल (Lieutenant Governor) सर एंड्रयू फ्रेजर (Sir Andrew Fraser) ने एक बड़ा नीतिगत फैसला लिया। उन्होंने आदेश दिया कि इस पूरे उपखंड (Subdivision) का मुख्यालय गोविंदपुर से हटाकर ‘धनबाद’ ट्रांसफर किया जाए।
- 27 जून 1908 (वास्तविक हस्तांतरण): हालांकि यह निर्णय 1904 में ही ले लिया गया था, लेकिन जमीनी स्तर पर दफ्तरों और व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने में समय लगा। आखिरकार, 27 जून सन् 1908 को वास्तविक रूप से मुख्यालय को धनबाद स्थानांतरित कर दिया गया।
🏢 धनबाद ट्रांसफर का झरिया और आस-पास के इलाकों पर असर
27 जून 1908 को जैसे ही मुख्यालय आधिकारिक तौर पर धनबाद शिफ्ट हुआ, इस क्षेत्र की तस्वीर तेजी से बदलने लगी:
आधुनिक सुविधाओं का विस्तार: मुख्यालय बनने के साथ ही ब्रिटिश सरकार ने धनबाद में विभिन्न प्रशासनिक दफ्तर, न्याय व्यवस्था, अस्पताल और अन्य नागरिक सुविधाएं प्रदान करना शुरू कर दिया।
आबादी का आकर्षण: इन आधुनिक सुविधाओं और बढ़ते व्यापारिक अवसरों के कारण झरिया राज सहित आस-पास के क्षेत्रों और बाहरी राज्यों के लोग धनबाद में आकर निवास करने के लिए तेजी से आकर्षित हुए। इसी ऐतिहासिक बदलाव ने आगे चलकर धनबाद को ‘कोयलांचल’ के सबसे बड़े केंद्र के रूप में स्थापित किया।

झरिया के राजाओं की अनमोल विरासत: ऐतिहासिक स्कूल, कॉलेज और जनहित के वो कार्य जो आज भी हैं जीवित
झरिया के राजाओं का इतिहास केवल युद्ध, जमींदारी और रॉयल्टी तक ही सीमित नहीं था। यहाँ के राजवंश ने शिक्षा के प्रसार और जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए। आज भी उनके द्वारा स्थापित किए गए स्कूल, कॉलेज और स्मारक झरिया की पहचान और गौरव बनकर सीना ताने खड़े हैं।
🎓 झरिया राज हाई स्कूल, धनबाद (स्थापना: 1866)
शिक्षा के क्षेत्र में झरिया राज परिवार का योगदान सदियों पुराना है। झरिया राज हाई स्कूल की स्थापना सन् 1866 में की गई थी। यह धनबाद और झरिया क्षेत्र के सबसे शुरुआती और ऐतिहासिक स्कूलों में से एक है, जिसने इस कोयलांचल क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
💧 राजा दुर्गा प्रसाद सिंह की ऐतिहासिक पानी टंकी (1912-13)
जनता को बुनियादी सुविधाएं देने के मामले में भी यहाँ के राजा काफी दूरदर्शी थे:
- पानी की समस्या से मुक्ति: सन् 1912-13 के दौरान झरिया क्षेत्र के लोगों को पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ता था।
- विशाल पानी टंकी का निर्माण: जनहित को सर्वोपरि रखते हुए तत्कालीन राजा दुर्गा प्रसाद सिंह ने अपने क्षेत्र के लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक विशाल पानी की टंकी का निर्माण करवाया।
- वर्तमान स्थिति: राजाओं की इस बेहतरीन इंजीनियरिंग और दूरदर्शिता के प्रतीक को आज प्रशासन द्वारा संरक्षित (Preserve) किया जा रहा है।
🏛️ राजा शिव प्रसाद (RSP) कॉलेज (स्थापना: 1951)
यह इस पूरे क्षेत्र का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित कॉलेज है, जिसे आज हम RSP कॉलेज के नाम से जानते हैं।
- पिता की स्मृति में निर्माण: इस कॉलेज की स्थापना सन् 1951 में झरिया के अंतिम राजा, राजा काली प्रसाद सिंह द्वारा अपने दिवंगत पिता राजा शिव प्रसाद सिंह की याद में की गई थी।
- ऐतिहासिक जुड़ाव: झरिया का प्रसिद्ध ‘राजा तालाब’ और यह कॉलेज, दोनों ही राज परिवार की इसी विरासत का हिस्सा हैं जिसने झरिया को एक नई सांस्कृतिक पहचान दी।
🏫 किड्स गार्डन सेकेंडरी स्कूल, झरिया (1985)
आजाद भारत में जमींदारी प्रथा खत्म होने के बाद भी राज परिवार का शिक्षा के प्रति लगाव कम नहीं हुआ। सन् 1985 के अंत में, राजा काली प्रसाद सिंह ने झरिया में शिक्षा के स्तर को और आधुनिक बनाने के लिए किड्स गार्डन सेकेंडरी स्कूल (Kids Garden Secondary School, Jharia) को शुरू करने और इसके पैर जमाने में बहुत बड़ी आर्थिक और प्रशासनिक मदद की थी।
झरिया की ऐतिहासिक दुर्गा पूजा: 1861 से चली आ रही शाही परंपरा और शस्त्र पूजा का रहस्य
झरिया का इतिहास सिर्फ कोयले की खदानों, जमींदारी और आलीशान किलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं भी बेहद अनूठी हैं। झरिया राज परिवार द्वारा शुरू की गई पारंपरिक दुर्गा पूजा आज भी पूरे धनबाद जिले और झरिया शहर के आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र है। सदियाँ बीत जाने के बाद भी यह शाही परंपरा आज भी उसी शिद्दत और रीति-रिवाजों के साथ निभाई जाती है।
सन् 1861 में हुई थी शुरुआत
झरिया के शाही परिवार ने सन् 1861 में इस भव्य और पारंपरिक दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। तब से लेकर आज तक, बिना रुके हर साल यह पूजा परंपरागत रूप से मनाई जा रही है। भले ही समय के साथ राजाओं का राजपाट चला गया, लेकिन इस पूजा की भव्यता और लोगों की आस्था में कोई कमी नहीं आई है।
🏰 पुराना राजागढ़: अतीत का गवाह
इस पूजा का सीधा जुड़ाव झरिया के पुराने किलों से है। ‘पुराना राजागढ़’ (पुराने किले का क्षेत्र) कभी राज परिवार का पैतृक महल हुआ करता था। आज भले ही ये इमारतें जर्जर हालत में हैं, लेकिन शारदीय नवरात्रि के दौरान इन ऐतिहासिक शाही किलों की रौनक देखने लायक होती है।
📍 तीन विशेष स्थानों पर होती है महापूजा
झरिया की इस पारंपरिक दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह किसी एक पंडाल में नहीं, बल्कि राज परिवार से जुड़े तीन अलग-अलग ऐतिहासिक स्थानों पर संपन्न होती है:
- पुराने किले का मंदिर: पूजा का मुख्य हिस्सा पुराने राजागढ़ (पुराने किले) के पास स्थित ऐतिहासिक मंदिर में आयोजित होता है, जहाँ सदियों पुराने रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है।
- नए किले का मंदिर: राज परिवार के नए किले के भीतर बने मंदिर में भी पूरे विधि-विधान के साथ माँ दुर्गा की आराधना की जाती है।
- शिरा घर (शस्त्र और कुलदेवता का स्थान): यह इस पूजा का सबसे रहस्यमयी और महत्वपूर्ण स्थान है। ‘शिरा घर’ वह पवित्र स्थान है जहाँ राज परिवार के कुलदेवता की पूजा होती है। साथ ही, इसी स्थान पर राजा-महाराजाओं के दौर के ऐतिहासिक हथियार (शस्त्र) रखे जाते हैं, जिनकी नवरात्रि के दौरान विशेष ‘शस्त्र पूजा’ की जाती है।
झरिया के राजाओं का राजनीतिक सफर और खनिक खोरा रामजी चावड़ा का योगदान
झरिया का इतिहास सिर्फ राजशाही और कोयले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बदलते वक्त के साथ यहाँ के राजवंश ने देश की लोकतांत्रिक राजनीति में भी कदम रखा। इसके साथ ही, झरिया को औद्योगिक पहचान देने में ‘सेठ खोरा रामजी चावड़ा’ जैसे दूरदर्शी दिग्गजों का बड़ा योगदान रहा। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक सफर को।
🗳️ राजा काली प्रसाद सिंह का राजनीतिक सफर: 1952 का ऐतिहासिक चुनाव
जमींदारी प्रथा के खात्मे के दौर में झरिया के शाही परिवार ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी किस्मत आजमाई:
- 1952 का पहला चुनाव: झरिया के अंतिम राजा, राजा काली प्रसाद सिंह ने राजनीति में कदम रखते हुए सन् 1952 में बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ा।
- कड़ा मुकाबला: राजा काली प्रसाद सिंह का अपने क्षेत्र में भारी दबदबा और प्रभाव था, लेकिन इस चुनाव में उन्हें धनबाद के बेहद लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी, कोयला खननकर्ता और श्रमिक नेता पुरुषोत्तम के. चौहान से पराजय का सामना करना पड़ा।
- बलियापुर से दर्ज की जीत: इस हार के बावजूद राजा काली प्रसाद सिंह पीछे नहीं हटे। उन्होंने आगे चलकर झारखंड पार्टी के टिकट पर सिंदरी के समीप बलियापुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की।
🏛️ वर्तमान राजनीति में राज परिवार का प्रभाव
हालांकि राजा काली प्रसाद सिंह के बाद उनके परिवार के सीधे सदस्यों ने लंबे समय तक चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन क्षेत्र में उनका सम्मान और प्रभाव आज भी कायम है। वर्तमान दौर में भी इस राज परिवार की नई पीढ़ी राजनीति में सक्रिय है:
- माधवी सिंह: झरिया के शाही परिवार के मौजूदा सदस्य सुजीत प्रसाद सिंह की पत्नी माधवी सिंह आज भी स्थानीय स्तर पर राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय हैं।
- स्नेहलता कुमारी देवी: राजा काली प्रसाद सिंह की सुपुत्री और राजा बिशेश्वर Prasad सिंह की धर्मपत्नी स्नेहलता कुमारी देवी भी राजनीति का एक बड़ा चेहरा हैं। वे वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (BJP) उड़ीसा के संबलपुर क्षेत्र की महासचिव के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं।
⛏️ सेठ खोरा रामजी चावड़ा: कोयलांचल के बहुआयामी महानायक (1860 – 1923)
जब झरिया के औद्योगिक विकास की बात होती है, तो सेठ खोरा रामजी चावड़ा का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिया जाता है। 20वीं सदी की शुरुआत में धनबाद और झरिया को बिजनेस हब बनाने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक थी:
- बहुआयामी व्यक्तित्व: खोरा रामजी चावड़ा केवल एक खदान मालिक नहीं थे, बल्कि वे एक प्रतिष्ठित रेलवे ठेकेदार, बैंकर और बहुत बड़े परोपकारी (Philanthropist) व्यक्ति थे।
- रेलवे और माइनिंग के पुरोधा: उन्होंने झरिया और धनबाद के शुरुआती रेलवे नेटवर्क के निर्माण में ठेकेदारी की और बाद में यहाँ कई प्रसिद्ध कोयला खदानों (जैसे खास झरिया कोलिएरी) की स्थापना की।
- ब्रिटिश काल में भारतीय गौरव: अंग्रेजों के शासनकाल में जब ज्यादातर बड़े व्यापारों पर ब्रिटिश कंपनियों का कब्जा था, तब सेठ खोरा रामजी ने एक भारतीय उद्यमी के रूप में अपनी कामयाबी का लोहा मनवाया, जिसे ब्रिटिश राजपत्रों ने भी स्वीकार किया।
📋 सेठ खोरा रामजी चावड़ा: एक नज़र में (Quick Biography)
झरिया को कोयलांचल और व्यापारिक केंद्र बनाने वाले महान उद्यमी सेठ खोरा रामजी चावड़ा का संक्षिप्त जीवन परिचय इस प्रकार है:
| विवरण | ऐतिहासिक तथ्य |
| पूरा नाम | सेठ खोरा रामजी चावड़ा (Khora Ramji Chawda) |
| अन्य लोकप्रिय नाम | खोरा रामजी |
| जन्म | सन् 1860, सिनुगरा (कच्छ, गुजरात) |
| मृत्यु | सन् 1923, झरिया (ब्रिटिश भारत) |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| मुख्य व्यवसाय | कोयला खनिक (Coal Miner), बैंकर (Banker), रेलवे ठेकेदार (Railway Contractor) |
| विशेष ख्याति | भारत में कोयला खनन के अग्रणी (Pioneer) और ऐतिहासिक रेलवे पुलों के निर्माण विशेषज्ञ |
🔨 रेलवे पुल निर्माण और माइनिंग में विशेषज्ञता
सेठ खोरा रामजी चावड़ा के इतिहास की ये कड़ियाँ उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाती हैं:
- कच्छ से झरिया का सफर: गुजरात के कच्छ (सिनुगरा) में जन्मे खोरा रामजी ने ब्रिटिश भारत के दौरान अपनी काबिलियत के दम पर झरिया को अपनी कर्मभूमि बनाया।
- रेलवे पुल निर्माण के जादूगर: वे सिर्फ सामान्य ठेकेदार नहीं थे, बल्कि उन्हें उस दौर में बेहद जटिल और मजबूत रेलवे पुलों का निर्माण (Railway Bridge Construction) करने के लिए विशेष रूप से जाना जाता था। उनके द्वारा तैयार बुनियादी ढांचे ने ही झरिया के कोयला उद्योग को भारतीय रेलवे से जोड़ा।
- कोयला खनन के अगुआ: उन्होंने देश के सबसे शुरुआती भारतीय कोयला खदान मालिकों में शामिल होकर ब्रिटिश कंपनियों के एकाधिकार को चुनौती दी और झरिया को ‘कोल कैपिटल’ बनाने में नींव की ईंट का काम किया।
सेठ खोरा रामजी चावड़ा: झरिया में अंग्रेजों का एकाधिकार तोड़ने वाले पहले भारतीय और उनके महान कार्य
झरिया के कोयलांचल इतिहास में सेठ खोरा रामजी चावड़ा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। ब्रिटिश भारत के उस दौर में जब कोयला खदानों पर पूरी तरह से यूरोपीय (अंग्रेजों) का कब्जा हुआ करता था, तब इस भारतीय नायक ने न सिर्फ उस एकाधिकार को चुनौती दी, बल्कि सफलता का एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।
🏡 जन्म और गौरवशाली पृष्ठभूमि
- जन्म स्थान: खोरा रामजी चावड़ा का जन्म गुजरात के कच्छ जिले के ‘सिनुगरा’ नामक एक छोटे से गाँव में हुआ था।
- समुदाय: वे कच्छ के प्रसिद्ध और पराक्रमी ‘मिस्त्री समुदाय’ (Kutch Gurjar Kshatriya / Mistri Community) से ताल्लुक रखते थे, जो अपनी अद्भुत निर्माण कला और इंजीनियरिंग कौशल के लिए पूरे भारत में विख्यात था।
⛏️ यूरोपीय एकाधिकार को तोड़ने वाले पहले भारतीय: 1895 की क्रांति
सन् 1900 की शुरुआत से पहले झरिया के कोयला क्षेत्रों का यूरोपीय लोगों द्वारा जमकर शोषण और दोहन किया जा रहा था। व्यापार के इस कठिन दौर में सेठ खोरा रामजी अवसर को भांपने वाले पहले भारतीय बने:
- यूरोपीय एकाधिकार का अंत: उन्हें झरिया कोयला क्षेत्र में यूरोपियों के व्यावसायिक एकाधिकार को सफलतापूर्वक तोड़ने वाले पहले भारतीय होने का गौरव प्राप्त है।
- खास झरिया कोलियरी (1895): उन्होंने सन् 1895 में अपनी पहली आधिकारिक खदान स्थापित की, जिसे ‘खास झरिया कोलियरी’ के नाम से जाना गया।
- साम्राज्य का विस्तार: उनकी दूरदर्शिता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सन् 1910 आते-आते उन्होंने क्षेत्र में पाँच और नई कोलियरी (कोयला खदानें) स्थापित कर दी थीं।
💼 प्राइवेट बैंकर और व्यावसायिक साझेदार
खोरा रामजी केवल खदानों तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे झरिया कोयला बेल्ट के कई कोलफील्ड्स में एक बड़े फाइनेंसिंग पार्टनर (वित्तपोषक) भी थे।
- निजी बैंकिंग: वे उस दौर में एक प्रतिष्ठित प्राइवेट बैंकर के रूप में काम किया करते थे, जो अन्य खदान मालिकों को वित्तीय मदद देते थे।
- पारिवारिक साझेदारी: अपने सौतेले भाई जेठाभाई लीरा जेठवा (1862 – 1932) के साथ मिलकर उनके पास ‘खास नागोरा कोलियरी’ का भी स्वामित्व था। यह पूरा व्यवसाय ‘जे. एंड के. रामजी’ (J. & K. Ramji) कंपनी के नाम और स्टाइल के तहत संचालित होता था।
🚂 इंजीनियरिंग के बेजोड़ कारनामे: रेलवे और पुलों का निर्माण
अशिक्षित होने के बावजूद, खोरा रामजी के पास निर्माण और इंजीनियरिंग सिद्धांतों की ऐसी जन्मजात और स्पष्ट समझ थी कि बड़े-बड़े ब्रिटिश अधिकारी भी उनके मुरीद थे। उन्होंने देश में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कई विशाल कार्य किए:
- सिंध और उत्तर-पश्चिम भारत: इस क्षेत्र में उन्होंने लगभग 100 मील लंबी रेलवे लाइन बिछाने का अभूतपूर्व कार्य किया।
- एस.एम. रेलवे: दक्षिणी मराठा (S.M.) रेलवे के तहत 20 मील लंबी रेलवे लाइन का निर्माण किया।
- ईस्ट बंगाल रेलवे: यहाँ भी उन्होंने 2 मील लंबी रेलवे लाइन बिछाई।
- हुबली लोको क्वार्टर व पुल: हुबली (कर्नाटक) में रेलवे के लोको क्वार्टर बनाने के साथ-साथ उन्होंने कई बड़े और जटिल रेलवे पुलों (Railway Bridges) का निर्माण भी सफलतापूर्वक पूरा किया।
🤝 भाइयों का साथ और व्यक्तिगत संघर्ष
शुरुआती दिनों में खोरा रामजी और उनके बड़े भाई भारत के विभिन्न हिस्सों में एक साथ रेलवे ठेकेदारी का काम कर रहे थे। एक सफल ठेकेदार के रूप में उभरने के बाद, सभी भाइयों ने हाथ मिलाया और खुद को एक सिंडिकेट (Syndicate) के रूप में गठित किया, जिसके तहत उन्होंने ‘MSM रेलवे’ में कई बड़े प्रोजेक्ट्स पूरे किए।
जीवन का कठिन दौर: दुर्भाग्यवश, समय के साथ उन्होंने अपने सभी भाइयों को खो दिया और वे इस विशाल व्यवसाय को संभालने के लिए लगभग अकेले रह गए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बिना किसी औपचारिक शिक्षा के, उन्होंने तकनीकी बारीकियों को रेलवे अधिकारियों की संतुष्टि के अनुसार पूरा किया और समय पर सभी कॉन्ट्रैक्ट्स सौंपे।
💰 “मल्टी-मिलियन और फर्स्ट क्लास पार्टी”
सन् 1900 का साल उनके व्यावसायिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। झरिया में उनकी अपार सफलता और ईमानदारी को देखते हुए कई ब्रिटिश जिला अधिकारियों ने सरकारी रिकॉर्ड और राजपत्रों में उन्हें “मल्टी-मिलियन (करोड़पति) और झरिया की प्रथम श्रेणी (फर्स्ट-क्लास) पार्टियों में से एक” के रूप में संबोधित किया था।
सेठ खोरा रामजी चावड़ा के ऐतिहासिक रेलवे और पुल निर्माण कार्य: एक मुकम्मल टाइमलाइन (1880 – 1903)
अशिक्षित होने के बावजूद इंजीनियरिंग के सिद्धांतों की बेजोड़ समझ रखने वाले सेठ खोरा रामजी चावड़ा ने देश के कोने-कोने में रेलवे नेटवर्क और पुलों का निर्माण किया। सन् 1880 से लेकर 1903 के बीच उनके द्वारा किए गए कुछ सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कार्यों की टाइमलाइन इस प्रकार है:
शुरुआती ऐतिहासिक प्रोजेक्ट्स (1880 – 1884)
- सन् 1880 (हुबली लोको शेड और उत्तर-पश्चिम लाइन): खोरा रामजी ने हुबली (कर्नाटक) में रेलवे के प्रसिद्ध ‘लोको शेड’ का निर्माण किया। इसी दौरान उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत में लगभग 100 मील लंबी रेलवे लाइन बिछाने का एक विशाल और चुनौतीपूर्ण काम पूरा किया।
- दक्षिणी मराठा रेलवे (SMR): उन्होंने दक्षिणी मराठा रेलवे के अंतर्गत 20 मील लंबी रेलवे लाइन का निर्माण पूरी तकनीकी सटीकता के साथ किया।
- सन् 1882 – 1884 (होटगी और गदग प्रोजेक्ट): अपने भाइयों के साथ मिलकर उन्होंने होटगी (SMR) में 177 मील के हिस्से पर काम किया। इसके साथ ही गदग में ईस्ट बंगाल रेलवे के तहत 22 मील लंबी रेलवे लाइन बिछाने का काम भी सफलतापूर्वक पूरा किया।
🚂 झरिया को जोड़ने वाली लाइफलाइन का निर्माण (1888 – 1895)
- सन् 1888 (बिलासपुर-झारसुगुड़ा और चंपा नदी पुल): बंगाल नागपुर रेलवे (BNR) के तहत उन्होंने बिलासपुर से झारसुगुड़ा (उड़ीसा) के बीच 128 मील लंबी रेलवे लाइन का निर्माण किया। इस प्रोजेक्ट में उन्होंने अपने मिस्त्री समुदाय के साथियों के साथ मिलकर ‘चंपा नदी’ पर एक बेहद मजबूत रेलवे पुल भी बनाया।
- सन् 1894 (EIR की झरिया शाखा लाइन): यह झरिया के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। उन्होंने ईस्ट इंडियन रेलवे (EIR) की ‘झरिया शाखा लाइन’ (Jharia Branch Line) का निर्माण किया। इसी रेलवे लाइन ने आगे चलकर झरिया के कोयला व्यवसाय को देश के बड़े बंदरगाहों और बाजारों से जोड़ा।
- सन् 1895 (पूर्वी तट रेलवे और गंजम पुल): उन्होंने ईस्ट कोस्ट रेलवे (Eastern Coast Railway) के नेटवर्क को विस्तार देते हुए रेलवे लाइन बिछाई और गंजम में नदी पर एक विशाल पुल का निर्माण किया।
सन् 1903: अंतिम रेलवे कार्य और बैंकिंग क्षेत्र में कदम
सन् 1903 में सेठ खोरा रामजी ने अपने जीवन का आखिरी और सबसे बड़ा रेलवे कॉन्ट्रैक्ट पूरा किया। उन्होंने इलाहाबाद – लखनऊ खंड में पवित्र गंगा नदी पर एक विशाल रेलवे पुल का निर्माण किया। यह इंजीनियरिंग का एक अद्भुत नमूना था।
रेलवे कॉन्ट्रैक्ट छोड़ने की वजह: गंगा नदी पर इस ऐतिहासिक पुल का निर्माण कार्य करते समय, ब्रिटिश इंजीनियर आई. एल. गेल (I.L. Gale) द्वारा उन्हें बेवजह मानसिक रूप से परेशान और प्रताड़ित किया जाने लगा था। अंग्रेजों के इस पक्षपातपूर्ण और दमनकारी रवैये से तंग आकर सेठ खोरा रामजी ने एक स्वाभिमानी भारतीय की तरह रेलवे के सभी सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स को हमेशा के लिए छोड़ने का एक बड़ा फैसला किया।
इसके बाद वे पूरी तरह से झरिया लौट आए और माइनिंग किंग बनने के साथ-साथ एक सफल निजी बैंकर (Private Banker) के रूप में स्थापित हुए, जिसने आगे चलकर कई भारतीय व्यवसायियों की मदद की।
झरिया रेलवे स्टेशन की खुदाई और कोयले की खोज: सेठ खोरा रामजी की कोलियरियों और ‘गुजराती बस्ती’ का गौरवशाली इतिहास
झरिया के इतिहास में सन् 1894-95 का कालखंड एक ऐसी युगांतकारी घटना का गवाह बना, जिसने इस पूरे क्षेत्र की तकदीर और तस्वीर हमेशा के लिए बदल दी। ब्रिटिश दस्तावेजों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के अनुसार, झरिया में बड़े पैमाने पर कोयले की मौजूदगी का पहला व्यावहारिक संकेत तब मिला, जब यहाँ देश की लाइफलाइन यानी रेलवे पटरी बिछाने का काम चल रहा था।
🚂 झरिया रेलवे स्टेशन की खुदाई और कोयले की पहली खोज (1894 – 1895)
यह झरिया के इतिहास का सबसे दिलचस्प और प्रामाणिक पहलू है:
- EIR रेलवे लाइन का विस्तार: सन् 1894-95 में ईस्ट इंडियन रेलवे (EIR) ने कोयले के परिवहन को आसान बनाने के लिए बराकर से धनबाद होते हुए कतरास और झरिया तक अपनी नई रेलवे लाइन का विस्तार करने का फैसला किया।
- खोरा रामजी का रेलवे कॉन्ट्रैक्ट: इस ‘झरिया शाखा लाइन’ (Jharia Branch Line) को बिछाने और झरिया रेलवे स्टेशन का निर्माण करने का मुख्य अनुबंध (Contract) सेठ खोरा रामजी और उनके भाई जेठा लीरा के पास था।
- खुदाई में निकला ‘काला सोना’: इतिहास गवाह है कि जब सेठ खोरा रामजी की देखरेख में झरिया रेलवे स्टेशन और रेलवे लाइन बिछाने के लिए जमीन की खुदाई की जा रही थी, ठीक उसी समय मिट्टी के नीचे भारी मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाले कोयले के भंडार (Coal Discovery) की खोज हुई। इस खोज ने झरिया को रातों-रात भारत के नक्शे पर चमका दिया।
📜 ब्रिटिश रिकॉर्ड्स में खोरा रामजी के ‘गणितीय कौशल’ की तारीफ
बिना किसी औपचारिक कॉलेज शिक्षा के, सेठ खोरा रामजी के पास अद्भुत इंजीनियरिंग और गणितीय समझ थी, जिसका लोहा खुद अंग्रेजों ने भी माना:
ब्रिटिश रिकॉर्ड (वर्ष 1920) के अनुसार: “सेठ खोरा रामजी ने इन सभी बड़े कार्यों को संतोषजनक ढंग से पूरा करने के लिए बहुत श्रेय और सम्मान प्राप्त किया। उनके भीतर काम को लेकर गजब का कौशल, श्रम के प्रति निष्ठा और कई जटिल गणितीय गणनाओं (Mathematical Calculations) को चुटकियों में हल करने का अद्भुत गुण था।”
⛏️ खोरा रामजी द्वारा स्थापित झरिया की प्रमुख कोलियरियाँ
अवसर को भांपते हुए सेठ खोरा रामजी ने तुरंत कोलियरी व्यवसाय में कदम रखा। वे दो खदानों के इकलौते मालिक होने के साथ-साथ लगभग आठ अन्य कोलियरियों के मुख्य फाइनेंसिंग पार्टनर (वित्तपोषक) बन गए। ‘खोरा रामजी एंड ब्रदर्स’ ने क्षेत्र में इन प्रमुख कोलियरियों की नींव रखी:
- खास झरिया कोलियरी (Khas Jharia)
- जेनागोरा कोलियरी (Jeenagora)
- जामाडोबा कोलियरी (Jamadoba)
- बलिहारी कोलियरी (Balihari)
- फतेहपुर कोलियरी (Fatehpur)
- गरेरिया कोलियरी (Gareria)
- बांसजोरा कोलियरी (Bansjora)
- भगतडीह कोलियरी (Bhagatdih)
इसके अलावा, खास झरिया कोलियरी में खोरा रामजी के साथ उनके भाई दीवान बहादुर डी.डी. ठाकर भी शामिल थे। वहीं, तीसरा (मुकुन्दा) में स्थित ‘भारतीय झरिया कोलियरी’ में वे ‘खोरा रामजी खिमजी वालजी एंड कंपनी’ के साथ मुख्य भागीदार (Partner) थे।
🤝 जब झरिया बन गया ‘गुजराती और कच्छी’ माइनिंग हब
सेठ खोरा रामजी की इस अभूतपूर्व सफलता को देखकर कच्छ और गुजरात के अन्य दूरदर्शी व्यापारियों और खनिकों ने भी झरिया का रुख करना शुरू कर दिया:
- गुजराती बस्ती में तब्दील हुआ झरिया: देखते ही देखते झरिया का यह पूरा क्षेत्र देश के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र और एक तरह से ‘गुजराती बस्ती’ में बदल गया।
- खदानों का समीकरण: उस ऐतिहासिक दौर में झरिया बेल्ट के भीतर सक्रिय कुल गुजराती कोलियरियों की संख्या 92 तक पहुँच गई थी, जिनमें से करीब 50 कोलियरियाँ अकेले कच्छी उद्योगपतियों के स्वामित्व में थीं। इस प्रकार, कच्छ के मिस्त्री समुदाय और गुजरात के व्यापारियों ने ब्रिटिश कंपनियों के एकाधिकार को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया।
झरिया के राजा से पट्टा और भारत का पहला कोयला संघ: ब्रिटिश रिकॉर्ड्स में दर्ज सेठ खोरा रामजी का साम्राज्य
झरिया रेलवे स्टेशन और रेलवे लाइन की खुदाई के दौरान जब कोयले के विशाल भंडार का पता चला, तो सेठ खोरा रामजी चावड़ा ने अपनी असाधारण व्यापारिक दूरदर्शिता का परिचय दिया। उन्होंने न केवल खुद को स्थापित किया, बल्कि पूरे भारतीय मिस्त्री समुदाय को खनन उद्योग में आगे बढ़ाने के लिए एक ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत की।
🤝 राजा से जमीन की खरीदी और 8 बड़े कोयला क्षेत्रों का साम्राज्य (1895 – 1909)
रेलवे स्टेशन के पास काम करते हुए खोरा रामजी ने भांप लिया था कि इस धरती के नीचे ‘काले सोने’ का अथा भंडार छिपा हुआ है। इसके बाद उन्होंने कदम बढ़ाए:
- शाही जमीन की खरीदी: उन्होंने तुरंत झरिया के तत्कालीन राजा से मुलाकात की और उन जमीनों को सीधे खरीद लिया, जहाँ सबसे ज्यादा कोयला होने की उम्मीद थी।
- साम्राज्य विस्तार: सन् 1895 से 1909 के बीच उन्होंने झरिया बेल्ट में लगभग आठ बड़े कोयला क्षेत्र खरीदे।
- खनन पट्टा (Mining Lease): जमीनों को अपने अधिकार में लेने के बाद उन्होंने आधिकारिक तौर पर माइनिंग राइट्स (खनन अधिकारों के पट्टे) के लिए झरिया के राजा से संपर्क किया और इस तरह झरिया में भारतीय कोलियरी व्यवसाय की एक मजबूत नींव रखी।
💰 साथी मिस्त्री ठेकेदारों को फंडिंग और प्रोत्साहन
सेठ खोरा रामजी की सबसे बड़ी महानता यह थी कि वे अकेले आगे नहीं बढ़ना चाहते थे। वे अपने पूरे समाज और साथी ठेकेदारों को साथ लेकर चले:
- सामूहिक प्रगति की सोच: उन्होंने अपने साथ काम करने वाले साथी कच्छी मिस्त्री ठेकेदारों को भी झरिया में जमीन खरीदने और कोयला व्यवसाय में उतरने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया।
- प्राइवेट फाइनेंसिंग: जो ठेकेदार आर्थिक रूप से कमजोर थे, उन्हें खोरा रामजी ने खुद अपने पास से वित्त (Funding/Loan) दिया ताकि वे भी खदानों के मालिक बन सकें। उनकी इसी मदद के कारण ही झरिया में आगे चलकर 90 से अधिक गुजराती और कच्छी कोलियरियों का उदय हुआ।
📜 1917 के ब्रिटिश गजेटियर में आधिकारिक पहचान
सेठ खोरा रामजी के कोयला साम्राज्य की धमक इतनी बड़ी थी कि ब्रिटिश हुकूमत को भी अपने आधिकारिक दस्तावेजों में इसे प्रमुखता से दर्ज करना पड़ा।
सन् 1917 में जारी बंगाल, असम, बिहार और उड़ीसा के आधिकारिक गजेटियर्स (Gazetteers) में उनकी तीन सबसे प्रमुख कोयला खदानों का विशेष रूप से विवरण दिया गया है:
- जीनागोरा कोलियरी (Jeenagora)
- खास झरिया कोलियरी (Khas Jharia)
- गेरेरिया कोलियरी (Gareria)
🏛️ ‘स्वर्णिम दिनों की डायरी’ और भारत के पहले कोयला संघ का नेतृत्व
झरिया कोयला क्षेत्र के इतिहास की सबसे प्रामाणिक कड़ियों में से एक पुस्तक “झरिया में स्वर्णिम दिनों की डायरी” (झरिया के कोलफील्ड्स में कच्छ के गुर्जर क्षत्रिय समाज का एक संस्मरण और इतिहास) है, जिसे इतिहासकार नटवरलाल देवराम जेठवा द्वारा लिखा गया है।
इस ऐतिहासिक संस्मरण के विवरणों के अनुसार:
- पहले माइनिंग संघ का गठन: ब्रिटिश अधिकारियों के रिकॉर्ड में दर्ज भारत के पहले कोयला खदान मालिकों के संघ (First Union/Association) की स्थापना का श्रेय सेठ खोरा रामजी को जाता है।
- ऐतिहासिक नेतृत्व: खोरा रामजी ने ही ब्रिटिश अधिकारियों के सामने भारतीय खदान मालिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए इस पहले संघ का नेतृत्व किया था, जिसने आगे चलकर भारतीय कोयला उद्योग की दिशा तय की।
सेठ खोरा रामजी : झरिया के अग्रणी कोयला उद्योगपति और समाजसेवी
सेठ खोरा रामजी झरिया कोयलांचल के शुरुआती और प्रमुख कोयला उद्योगपतियों में से एक थे। उन्होंने न केवल कोयला खनन उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, बल्कि शिक्षा, धर्म और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किए।
मृत्यु और खनन व्यवसाय की विरासत
सेठ खोरा रामजी का निधन वर्ष 1923 में हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उनके स्वामित्व वाली कोयला खदानों का संचालन उनके पुत्रों करमशी खोरा, अंबालाल खोरा तथा अन्य उत्तराधिकारियों द्वारा जारी रखा गया। अंबालाल खोरा ने अपने पिता की रेलवे ठेकेदारी की विरासत को भी आगे बढ़ाया, हालांकि बाद में एक रेलवे दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
उनकी प्रसिद्ध कोयला खदानों में खास झरिया और स्वर्ण झरिया शामिल थीं, जहाँ लगभग 260 फीट गहरे शाफ्टों में खनन कार्य किया जाता था। 8 नवंबर 1930 को भूमिगत आग और खनन गतिविधियों के कारण भूमि धंसान की एक गंभीर घटना हुई, जिसमें लगभग 18 फीट तक भूमि बैठ गई। इस दुर्घटना से व्यापक विनाश हुआ तथा क्षेत्र के कई मकान और बंगले प्रभावित हुए।
खास जीनागोरा खदान का इतिहास

खास जीनागोरा खदान का संचालन बाद के वर्षों में जेठा लीरा जेठवा, करसंजी जेठाभाई तथा बाद में देवराम जेठाभाई जेठवा के पुत्रों द्वारा किया गया। यह खदान वर्ष 1938-39 तक उनके नियंत्रण में रही, जिसके बाद इसे बेच दिया गया। इसके पश्चात यह परिवार कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में कोयला खनन मशीनरी के आयात और व्यापार के क्षेत्र में स्थापित हो गया।
सेठ खोरा रामजी की अन्य खदानों का संचालन उनके भाइयों और उत्तराधिकारियों द्वारा लंबे समय तक किया जाता रहा। अंततः भारत सरकार द्वारा वर्ष 1971-72 में कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के दौरान इन खदानों को अपने अधीन ले लिया गया। यह राष्ट्रीयकरण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के कार्यकाल में हुआ था।
शिक्षा और समाज सेवा में योगदान
सेठ खोरा रामजी केवल एक सफल उद्योगपति ही नहीं, बल्कि एक महान समाजसेवी और परोपकारी व्यक्तित्व भी थे। अपने पैतृक गांव सिनुगरा में उन्होंने वर्ष 1910 में एक हिंदू मंदिर, सार्वजनिक कुएँ, स्वागत द्वार, चबूतरे तथा एक प्राथमिक विद्यालय का निर्माण करवाया और समाज को समर्पित किया।
यह विद्यालय आज “सेठ खोरा रामजी प्रचारक शाला” के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने वर्ष 1905 में झरिया एंग्लो-गुजराती स्कूल की स्थापना के लिए अन्य कोलियरी मालिकों के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक सहयोग प्रदान किया। यह विद्यालय उस समय क्षेत्र में गुजराती समुदाय की शिक्षा का प्रमुख केंद्र बना।
सेठ खोरा रामजी के पास पर्याप्त कृषि भूमि भी थी, जिसकी उपज का एक बड़ा हिस्सा गरीबों, जरूरतमंदों और असहाय लोगों की सहायता के लिए दान कर दिया जाता था।
महाराजा खेंगारजी तृतीय द्वारा सम्मान
वर्ष 1920 में सिनुगरा में आयोजित एक विशाल सार्वजनिक दान कार्यक्रम और वैदिक यज्ञ के अवसर पर कच्छ के महाराजा खेंगारजी तृतीय ने सेठ खोरा रामजी के सामाजिक योगदान की सराहना करते हुए उन्हें सम्मानस्वरूप एक विशेष पगड़ी भेंट की।
मथुरा में धर्मशाला निर्माण
रेलवे ठेकेदारी कार्य के दौरान मथुरा में प्रवास करते समय सेठ खोरा रामजी ने सिनुगरा के जेठा लीरा जेठवा के साथ मिलकर वर्ष 1889 से 1900 के बीच “कच्छ कड़िया धर्मशाला” का निर्माण करवाया। यह धर्मशाला यात्रियों और समाज के लोगों की सुविधा के लिए समर्पित की गई थी और उस समय के महत्वपूर्ण सामाजिक कार्यों में से एक मानी जाती है।
What is Jharia famous for?
Jharia famous basically Black Diamonds mean Coal.
झरिया कहां है
झरिया झारखंड राज्य के धनबाद जिले में स्थित है।
झरिया किसके लिए प्रसिद है?
काला हिरा के लिए यानि कोयला
Is Jharia coal mine still burning?
Somethings 110-120 (1914-16) years before.
Which city is known as coal capital of India?
Dhanbad


