हलधर नाग का जीवनी | Haldhar Nag biography in hindi

हलधर नाग का जीवनी | Haldhar Nag biography in hindi

हलधर नाग का जीवन परिचय

आज हम बात करेंगे कविता और महाकाव्य लिखने वाले पद्मश्री हलधर नाग जी के बारे में, जो पढे लिखे नाम मात्र के थे। कोई सोच भी नहीं सकता है कोई विश्वास ही नहीं कर सकता है कि हलधर नाग जी कभी ये मुकाम हासिल कर सकता है। इन्होंने बहुत ही कम समय बहुत सारे कविता लिख डाले, और साथ में इन्होंने 20 के करीब महाकाव्य लिखे। इनको आज सिर्फ कुछ गिने चुने लोग ही जानते हैं, क्योंकि इनके बारे लोग ज्यादा चर्चा नहीं करते हैं। जिस वजह से लोग इन्हे बहुत कम जानते हैं, पद्मश्री मिलने के बाद भी गाँव की गलियों में छोटी मोटी चीजे बेचने का काम करती रही।

हलधर नाग का जीवनी | Haldhar Nag biography in hindi

ये सब करने से हलधर नाग जी जरा सा भी नहीं हिचकते हैं, मात्र तीसरी कक्षा तक पढे लिखे हलधर नाग जी ने कोसली भाषा में बहुत सी कविताएं लिख डाले। साथ में 20 से भी अधिक महाकाव्य अभी तक लिख डाले। सबसे हैरत कि बात तो ये है कि हलधर नाग जी को अपनी सारी लिखी कविताएं आज भी मुंह जुबानी याद (स्मरण) है। आज के जमाने के बहुत से लोगों अब भी विश्वाश नहीं होता है कि मात्र तीसरी कक्षा तक पढे हलधर नाग जी ने कैसे इतनी बड़ी कविता रचना और महाकाव्य कि रचना कर दी।

तो आज इस आर्टिकल के माध्यम से इनके जीवन पर अच्छे से प्रकाश डालेंगे और जानने की कोशिश करेंगे। आखिर ये सब इन्होंने कैसे किया। आखिर कैसे हलधर नाग जी ने मात्र तीसरी कक्षा तक पढ़कर इतनी बड़ी महाकाव्य कि रचना की। बचपन में ही पिताजी के गुजर जाने के बाद से घर कि सारी जिम्मेवारियाँ हलधर नाग के ऊपर आ चुकी थी।

Haldhar Nag Birth : हलधर नाग का जन्म, परिवार व शिक्षा

हलधर नाग का जन्म 31 मार्च सन् 1950 को बहुत ही गरीब परिवार में घेन्स, बाड़गढ़ (उड़ीसा) में हुई। हलधर नाग जी मात्र तीसरी कक्षा तक पढे है, हलधर नाग जी मात्र 10 साल के थे तब इनके पिताजी का आकस्मिक निधन हो गया। निधन के बाद हलधर नाग जी को तीसरी कक्षा में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। क्योंकि इनके घर में कमाने वाला दूसरा कोई व्यक्ति नहीं था जिस कारण इनको पढ़ाई छोड़नी ही पड़ी।

हलधर नाग जी जीवन सफर

जब तीसरी कक्षा में पढ़ रहे थे तब इनके पिताजी के निधन हो गया और घर में कमाने वाला कोई और नहीं था। जिसके कारण Haldhar Nag जी को तीसरी कक्षा तक ही पढ़कर आगे कि पढ़ाई छोड़ दी। उसके बाद इन्होंने छोटी मोटी चाय कि दुकान खोली लेकिन दुकान नहीं चली। उसके बाद इनको एक मीट कि दुकान पर बर्तन साफ करने का काम मिला तो वहाँ पर एक शख्स ने देखा कि हलधर नाग जी के पास एक डायरी होता है और न जाने क्या क्या लिखता भी रहता है।

जब उसके बारे में पता चला तो उसको वहाँ से हटाकर वो अपने स्कूल ले गए और वहाँ एक कूक कि नौकरी दे दी खाना बनाने की और कहा तुम पढे लिखे लगते हो और कुछ लिखते रहते हो कम से कम काम तो साफ सुथरा किया करो इस घटना ने इनके जिंदगी में थोड़ा सा बदलाव जरूर आया था। हलधर नाग को जिस इंसान ने उस मीट शॉप से लेकर अपने साथ लाए थे उसने ही कहा कि तुम स्कूल के बाहर एक छोटा मोटा काम शुरू कर लो यहाँ से तुम्हें ज्यादा income नहीं हो पाएगा तुम स्कूल के बाहर छोटा सा स्टैशनेरी का दुकान खोल लो।

कवि Haldhar Nag जी 16 साल तक गाँव के एक स्कूल में बच्चों के लिए रसोइयाँ में खाना पकाने का काम करते रहा। जो उनका पेशा था वो उसकी नौकरी थी जिससे कुछ ज्यादा कमाई नहीं हो पाती थी और जब स्कूल कि वो नौकरी छोड़नी पड़ी यानि स्कूल का वो पद स्कूल कि तरफ से ही हटा दी गई। जिस वजह से उनकी ये नौकरी चली गई अब वो क्या करता? अब हलधर नाग जी किसी स्कूल के बाहर चादर बिछा के चने व चाकलेट आदि अन्य बच्चों के खाने की चीजे बेचना शुरू कर दिया।

जब हलधर नाग ने किताब की दुकान खोली

दुकान खोलने के लिए Haldhar Nag जी के पास उतने पैसे भी नहीं थे तो वही शिक्षक ने कहा चलो मैं तुम्हें बैंक से लोन दिलवा देता हूँ उसके बाद बैंक से उन्हे मात्र 1000 का लोन ही मिला। क्योंकि जब हलधर नाग जी बैंक गए लोन लेने के लिए तो बैंक वालों ने कहा कि आपके पास तो गिरवी रखने के लिए किसी भी तरह का संपत्ति या जमीन नहीं है। जिससे आपको ज्यादा लोन दे सकते है, उनके पास तो कुछ नहीं था, कि जिससे उनको ज्यादा लोन मिल सके।

फिर भी आपको 1000 रुपये मास के हिसाब से दे सकते हैं और तुम 10 – 10 रुपये करके इस लोन चुका देना। और धीरे धीरे इसी से अपना व्यापार बड़ा कर सकते हो। जैसे जैसे समान बिकेगा वैसे वैसे अपना समान और अधिक खरीद सकते हो इससे तुम्हारा काम चलता रहेगा। तो हलधर नाग ने 1000 रुपये कि स्टैशनेरी खरीदी, और एक छोटी सी स्टैशनेरी की दुकान खोली जिसमे ज्यादा समान नहीं थे क्योंकि एक हजार रुपये में उतने समान नहीं आते थे। अब बैंक का लोन भी देना है ब्याज भी देना है ये सब करके चुकाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था एक तरह से ये व्यापार भी घाटा ही पड़ा।

धंधा जितना है उतना ही करूंगा और एक छोटी सी किताबों की दुकान खोल ली जिसमे बाजारी किताबे थी। जो लोग हर दिन पढ़ने के काम में लाते थे। हलधर नाग को स्कूल के वक्त से ही कविता लिखने का बड़ा शौक था। जबकि हलधर नाग जी मात्र तीसरी कक्षा तक ही पढे थे बावजूद इसके वो कविता लिखते थे जब उनको वक्त मिलता था। हलधर नाग ने कभी भी कविता लिखनी बंद नहीं की।

बाद मे हलधर नाग जी ने दुकान पर लड़का भी रख लिया, जो घर घर किताबे किराये पर पहुंचाने का काम करते थे। किताबों को भाड़े पर भी पढ़ने देते थे पहले के समय में लोग किताब खरीद तो नहीं सकते थे लेकिन किराये पर लाकर पढ़ जरुर सकते थे। लेकिन अब ये चीजे नहीं है लोग अब किताबे खरीद सकते है पहले ये परंपरा बहुत चलती थी। लेकिन अब नहीं हाँ कुछ कुछ जगहों पर आज भी ऐसी बहुत सी ऐसी चीजे है जिनको लोग किराये पर देते है। इतना कुछ करने के बाद भी इनके जीवन में आर्थिक स्थिति कुछ भी नहीं बदली।

जब हलधर नाग कि रचनाएं पत्रिकाएं में छपी

लेकिन हाँ समय के साथ साथ Haldhar Nag जी के लेखन में बदलाव जरूर आया इन्होंने जो खाली में समय में जो कविताएं लिखते थे। एक समय जब इनके कुछ रचनाए किसी पत्रकार ने अपने पत्रिकाएं में छापी तो खूब तहलका मचा दी। दूसरी पत्रिकाएं में भी जब इनकी रचना छपी तो तहलका मची और तो और जब गुलजार साहब जी ने जब देश के बड़े बड़े 135 शायरो के दो दो नज़्म शायरी को अपने किताब में शामिल कर ली। और उनसे रहा नहीं गया और हलधर नाग जी कि कविताएं भी गुलजार साहब जी ने अपने किताब में जगह दी।

जब बाकायदा गुलजार साहब जी किताब प्रदर्शित हुई तो खुद गुलजार साहब जी ने इनको न्योता दिया बुलाया। उसके बाद इनकी रचना को तीन भागों में करके काव्यनजली के नाम से प्रकाशित की लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी इनके जीवन में उतना कुछ खास बदलवा नहीं दिखा। आर्थिक स्थिति उतनी कुछ खास नहीं बदली तो वहाँ पर संभलपुर यूनिवर्सिटी है बहुत ही प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी है उस क्षेत्र की तो उस यूनिवर्सिटी ने तीसरी कक्षा तक पढे हलधर नाग जी को Doctorate की उपाधि दे दी। और एक दिन इनको राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने साल 2016 में राष्ट्रपति भवन में बाकायदा बुलाकर हलधर नाग जी को पद्मश्री पुरुस्कार से खुद राष्ट्रपति ने सम्मानित किया।

हलधर नाग का जीवनी | Haldhar Nag biography in hindi

इतना बड़ा सम्मान मिलने के बावजूद भी Haldhar Nag जी आज भी दोनों काम बड़े इत्मीनान से करते हैं। गुलजार साहब जी की किताब में जगह मिल गई इनकी सारी की सारी रचनाए छप गई लेकिन आज भी इनके जीवन कुछ खास बदलाव देखने को नहीं मिले। जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो, आज भी पहले कि ही तरह रहते है और आज भी वहीं काम बेझिझक करते है। स्टैशनेरी बेचना बस आज स्टैशनेरी के समान थोड़ा ज्यादा रखते हैं और वक्त निकालकर कविताएं लिखना आज भी जारी है।

पद्मश्री सम्मान तो इन्हे मिला पर उसके साथ किसी भी तरह का इनाम कि राशि नहीं मिली। ये सम्मान ही उसके लिए काफी यही बहुत बड़ी है भले कुछ लोगों कि इसकी अहमियत न पता हो।

जब हलधर नाग की किताबें छपी

जब से इनकी किताबे छपनी शुरू हुई तब से इनको पारिश्रमिक मिलना शुरू हो गया है जिससे आज उनकी जीवन जीने के तरीके में थोड़ा जरूर बदलाव आया है। जीवन थोड़ा आसान जरूर हो गया है लेकिन रहन सहन आज भी वैसा है काम भी वही करते है। इनकी जो पहली कविता थी वो थी धो धो बारगाजी जिसका मतलब ‘पुराना बरगद’ होता है के नाम से लिखा जिसे वहाँ एक स्थानीय पत्रिका ने अपने पत्रकार में साल 1990 छापा और उसके बाद हलधर नाग जी की सभी कविताओं को पत्रिका में आए दिन छपती रहती थी। जब लोगों को पता चला तो आस-पास के गाँव से भी लोग समुदाय बना कर हलधर नाग जी को बड़े सम्मान से बुलाते थे।

हलधर नाग जी की कविताएँ लोगों को बहुत पसंद आने लगी थी हलधर नाग जो को तो लोग “लोक कविरत्न” के नाम से बुलाना शुरू कर दिया था। आज भी हलधर नाग जी जूता या चप्पल नहीं पहनते है क्योंकि उन्हे शुरू से ही ये सब पहनने कि आदत नहीं है। उसमे इनको घुटन होती है, चक्कर आने लगते है इसलिए हलधर नाग ढोती और बनियान पहनता है।

हलधर नाग कि किताबें जब अंग्रेजी में छपी

इनके कविता तो अब अंग्रेजी में भी छप चुकी हैं इनका एक संग्रह है इनकी एक किताब है जिसका अंग्रेजी में अनुवाद है जिसको आम आदमी खरीद ही नहीं सकता क्योंकि इसकी कीमत बहुत अधिक है इसको सिर्फ पुस्तकालय वाले ही खरीद सकते है। और इसकी बिक्री बहुत तेजी से हुई है इनकी कविताएं तीन खंडों में प्रकाशित हुई है खंड 1,2 और 3, तीसरा काव्यनजली खंड 3 को भी संभलपुर यूनिवर्सिटी ने ही प्रकाशित की और चौथा खंड भी प्रकाशित हो चुकी है। पुस्तक का नाम काव्यनजली है जो 3 खंडों में प्रकाशित हुआ।

हलधर नाग जी आज भी बहुत सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं और आज भी धोती कुर्ता ही पहनते है नंगे पाँव ही रहते हैं और वहीं पुराना व्यापार चल रहा था। तो लोगों ने ये सब करने से मना भी किया उसके बाद लोगों ने समझाया कि अब तो तुम्हारे पास अच्छे पैसे भी आने लगे है तो उससे तुम एक किताब कि दुकान खोल लो तब जा के हलधर नाग जी ने एक किताब की दुकान खोल ली और साथ में कविताएं भी लिखते है कविता लिखना इन्होंने बंद नहीं किया।

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