बिरसा मुंडा का जीवनी | Birsa Munda biography in hindi

बिरसा मुंडा जी का जीवन परिचय

बिरसा मुंडा जी वो शख्सियत हैं जिन्होंने झारखण्ड के लिए अपना बलिदान दे दिए, ऐसे कई क्रन्तिकारी है जिन्होंने झारखण्ड में अंग्रेजो के विरुद्ध बिरसा मुंडा जी के साथ दियें, कई आन्दोलन किये और उनके साथ शहीद भी हो गए। झारखण्ड में सन् 1800 – 1900 ईस्वी के बीच मुंडा जनजातियों पर अंग्रेज बहुत अत्याचार किया करते थे, उन्हें किसी भी तरह की आजादी नहीं दी जाती थी। किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं दिया जाता था, और उस समय आदिवासियों में भुखमरी जैसी स्थिति पैदा हो गई थी, ये सब चीजो को देखकर Birsa Munda जी को अत्यधिक दुख हुआ।

बिरसा मुंडा का फोटो

ऐसी स्थिति देखकर Birsa Munda जी अंग्रजो के विरुद्ध आदोलन करने पर मजबूर हो गए थे, और धीरे धीरे कार्यक्रम की माध्यम से इन्होंने लोगो को जागरूक करना शुरू किया। और धीरे धीरे लोग इनकी तरफ होते चले गए और आदिवासी समुदाय को अब लगने लगा था अब बिरसा मुंडा जी अंग्रजो को छोटानागपुर से बाहर निकाल फेंगेंगे। आगे ये आन्दोलन लम्बा चलने वाला था बड़ा युद्ध होनेवाला था। वहां के परिस्थितियों कि वजह से Birsa Munda जी ने ये सब करने की ठानी उन्हें पता था भविष्य में क्या होने वाला था इसलिए उन्हें ये सब करने को मजबूर किया।

तो चलिए शुरू करते है और जाने इनके जीवन के बारे में, इनके संघर्ष के बारे में इनके आन्दोलन के बारे में।

बिरसा मुंडा का फोटो

बिरसा मुंडा जी का जन्म, परिवार व शिक्षा (Birsa Munda Birth & Family)

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बिरसा मुंडा जी का जन्म 15 नवम्बर सन् 1875 ईस्वी को बंगाल प्रेसीडेंसी में थाना – तमाड़ , जिला – रांची, बिहार के अंतर्गत उलिहातू गांव में हुआ था। इनके पिता जी का नाम सुगना मुंडा था, बिरसा मुंडा माता जी का नाम करमी हटू था। इनके बड़े भाई कोमता मुंडा उसी गांव में रहता था, जहां उसका घर आज भी जर्जर हालातों में मौजूद है। Birsa Munda जी का परिवार काम की तलाश करते करते उलिहतु से कुरुमब्दा आकर बस गए। जहाँ खेतो में काम करके अपना जीवनयापन कर रहे थे, उसके बाद फिर से काम की खोज में उनका परिवार बम्बा पहुँच गए।

बिरसा मुंडा जी का शिक्षा चाईबासा मे स्थित मिशन स्कूल से हुई थी, और अपने पिता के साथ ईसाई धर्म को अपनाया था। लेकिन बाद में Birsa Munda ईसाई धर्म को छोड़ दिया, द्वितीय आनंद पांग के संपर्क के कारण वह वैष्णव धर्म से प्रभावित हुए, राम, कृष्ण, अर्जुन तथा भीम आदि कि कृतियों से बिरसा मुंडा जी बहुत प्रभावित हुए थे।

बिरसा मुंडा जी के द्वारा किये गए आंदोलन

इनका परिवार अधिकांश समय काम कि खोज में घूमते रहते थे, बिरसा जी जब थोड़े बड़े हुए तब वो भेड़ चराने का काम करने लगे और साथ में बाँसुरी बजाते थे। सन्न 1886 से 1890 का दौर के जीवन इनका बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है इस दरमियान इन्होंने इसाई धर्म के प्रभाव से अपने धर्म का अंतर समझा। उस समय सरदार आंदोलन शुरू हो गया था इसलिए उनके पिता ने बिरसा मुंडा जी का स्कूल छुड़वा दिया था। क्योंकि वो इसाई स्कूलों का विरोध कर रही थी, अब सरदार आन्दोलन की वजह से उनके दिमाग में ईसायियों के प्रति विद्रोह की भावना उत्पन्न हो गई थी।

बिरसा मुंडा का फोटो

Birsa Munda जी पर सरदारी आंदोलन का गहरा प्रभाव पड़ा, सरदारी आंदोलन की असफलता से कारण पूरे छोटानागपुर में असंतोष का माहौल पैदा हो गया था। आदिवासियों में कुशल नेतृत्व का अभाव था यानि कि उसे कोई सही रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं था। इन सब परिस्थितियों की वज़ह से Birsa Munda का प्रादुर्भव हुआ यानि कि सब के सामने आए और उन सब का नेतृत्व करने का फैसला लिया। जो आगे चलकर जनजातीय आकांक्षाओं (इच्छा, चाह, जरूरत) की मांगो को बिरसा मुंडा जी पूरा करवाते थे, जनजातियों में मुंडा जाति को ही सबसे ज्यादा परेशान किया जाता था। मुंडा जाति को न तो किसी प्रकार की स्वतंत्रता थी न ही किसी प्रकार का अधिकार दिया जाता था।

बिरसा मुंडा जी भी सरदार आन्दोलन में शामिल हो गये थे और अपने पारम्परिक रीती रिवाजो के लिए लड़ाई शुरू कर दी। अब मुंडा आदिवासियों के जमीन छीनने लगी थी, लोगो को जबरदस्ती ईसाई बनाने कि कोशिश कि जाने लगी और युवतियों को दलालों द्वारा उठा कर ले जाने लगी। ये सब देखकर बिरसा जी के मन में अंग्रेजो के खराब रवैये के के कारण विरोध करने कि क्रांति कि ज्वाला उठ चुकी थी।

बिरसा जी विद्रोह में इतने उग्र हो गये थे कि वहाँ के आदिवासी लोग उनको भगवान का दर्जा देने लगी। इतने साल बीतने के बाद भी इनके समुदाय के लोग तो पूजते ही हैं और अन्य लोग भी इन्हे पूजते हैं। उन्होंने धर्म परिवर्तन का विरोध शुरू किया और अपने आदिवासी लोगो को हिन्दू धर्म के सिद्धांतो को बेहतर ढंग से समझाने लगा। बिरसा मुंडा जी ने गाय की पूजा करने और साथ में लोगों को गौ-हत्या का विरोध करने को भी कहा।

बिरसा जी ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ नारा दिया “रानी का शाषन खत्म करो और हमारा साम्राज्य स्थापित करो” उनके इस नारे को आज भी झारखंड के आदिवासी इलाको में स्मरण किया जाता है। अंग्रेजो ने आदिवासी के कृषि प्रणाली में बदलाव कर दिया जिसके कारण आदिवासियों को काफी नुकसान होता था। सन्न 1895 में लगान कि माफी के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध बिरसा जी ने मोर्चा खोल दिया, बिरसा जी ने किसानों का शोषण करने वाले ज़मींदारों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा लोगों को दी। यह देखकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें लोगों की भीड़ इकट्ठा करने पर पाबंदी लगा दी।

बिरसा जी का कहना था कि मैं तो अपनी जाति को बस अपना धर्म सिखा और बता रहा हूँ। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार करने कि कोशिश की। लेकिन उनके गांव के लोगों ने उन्हें छुड़ा लिया, पुन: बिरसा जी को गिरफ़्तार करके 2 वर्ष के लिए हज़ारीबाग़ जेल में बंद कर दिया। बाद में उन्हें इस चेतावनी के साथ छोड़ दिया गया कि वे अगली बार से किसी भी तरह का कोई प्रचार प्रसार नहीं करेगा।

वे अपनी देवी देवताओ में भी विश्वास खोते जा रहे थे, क्योंकि उस पर जो अत्याचार कर रहे थे उससे वे खुद को बचा नहीं पा रहे थे और न ही उसे बचाने के लिए कोई सामने आ रहा था।

किन्तु बिरसा मुंडा जी ने इन्हे एक नया धर्म, एक नया जीवन – दर्शन और एक नया आचार सहिंता दिया, अब तक मुंडाओ ने जितना कुछ खोया था, इसे प्राप्त करने के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया। आदिवासियों को अब लगने लगा था कि अब बिरसा मुंडा (Birsa Munda) जी के जरिए से अंग्रेजों को छोटानागपुर से बड़े आसानी से खदेड़ जा सकता है। अपने आदिवासी भाइयों पर हुए अत्याचार से बिरसा मुंडा जी बहुत दुखी थे, उनकी गरीबी, लाचारी और भुखमरी ने उन्हे पूरा हिलाकर रख दिया।

आदिवासियों के भगवान कौन है? : बिरसा मुंडा जी के आन्दोलन 

बिरसा मुंडा जी ने आदिवासियों कि स्थिति मे सुधार लाने के लिए आध्यात्मिक प्रयास किया, शांति की तलाश में बिरसा मुंडा जी रात भर जाग कर बहुत चिंतन किया करते थे। हरी नाम लेना तक शुरू कर दिए थे, बिरसा मुंडा की चिंतनशील प्रवृति और कीर्तन पद्धति को देखकर युवा वर्ग को अपनी तरफ आकर्षित किया। इस तरह बिरसा मुंडा जी एक उपदेशक के रूप में उभरे, डॉ. सुरेश कुमार, डॉ. सचिनन्द, डॉ. एसपी. सिंह और श्री मुछि राय मुंडा एवं अन्य लेखकों ने लिखा था कि मौजूदा परिस्थितियों एवं विभिन्न धर्मावलंबियों (faithful) के संपर्क के कारण ही बिरसा मुंडा जी को लोगों के बीच भगवान के रूप में उभरे।

इन लेखकों के अनुसार दूर दूर से लोग जिनमे से पुरुष, महिलाएं, बच्चे और बूढ़े तक हर दिन समय पर बिरसा मुंडा का उपदेश सुनने के लिए पहुँच जाते थे। और कीर्तन के बाद बिरसा मुंडा जी धर्म के बारे में बताते थे, बिरसा मुंडा जी आदिवासियों के बीच फैले अंधविश्वास को दूर करना चाहते थे। और परोपकार को ही सर्वोच्च धर्म मानते थे, अनेक देवी देवताओ की जगह उन्होंने लोगों से केवल सिंग बोगा की उपासना करने का आग्रह किया। उन्होंने अपने अनुयायियों (followers) से हिंसा का परित्याग करने और पशु बलि को भी बंद करने का आग्रह किया।

हँडिया दारू पीने पर पाबंदी लगा दी गई, Birsa Munda जी अपने अनुयायियों से जनेऊ धारण करने को कहा, और हृदय की शुद्धता पर जोर दिया, बिरसा मुंडा जी ने प्रार्थना की और एक पुस्तक भी तैयार की। Birsa Munda जी ने कई लोगों को ईसाई धर्म से पुन: मुंडा धर्म में ले आए, और कइयों को ईसाई बनने से भी रोका। वृद्ध और दकियानूसी मुंडाओ ने बिरसा के सिद्धांतों को परंपरागत धर्म के विरुद्ध बताकर उनका विरोध किया, लेकिन बिरसा मुंडा कि लोकप्रियता और उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। उसके संबंध के बारे तरह तरह कि कहानियाँ फ़ैल गई, उन्हे भगवान का अवतार माना जा रहा था

जिनके स्पर्श मात्र से सभी प्रकार कि बीमारियाँ दूर हो जारी थी, स्वंय बिरसा मुंडा जी भी लोगों के बीच अपने को भगवान के रूप में प्रतिष्टित करने लगे थे। उन्होंने कहा कि प्रलय के बाद वे राजा बनेंगे और सरकार उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, धीरे धीरे स्थिति बहुत गंभीर होती गई। बिरसा मुंडा के उपदेशों से अंग्रेजों कि हुकूमत को चौकन्ना कर दिया था, बिरसा मुंडा जी अपने साथियों के साथ गिरफ्तार का लिया गए। और उन्हे 2.6 वर्ष की कारावास की सजा हुई, इस तरह बिरसा आंदोलन का प्रथम चरण समाप्त हो चुका था, शांतिपूर्ण तरीका और अहिंसात्मक दोनों चीजे इसमें शामिल थी।

बिरसा मुंडा जी जब जेल से बाहर निकले तो क्या हुआ?

सन् 1897 ईस्वी में हजारीबाग के जेल से बाहर आने के बाद Birsa Munda जी फिर बिरसा आंदोलन शुरू कर दिया। जेल से निकलते ही बिरसा मुंडा ने फिर से अपने अनुयायियों को पुन: एकठ्ठा करना शुरू कर दिया, सरकार से अब अंतिम फैसल करने का बिरसा मुंडा जी ने पक्का किया। सन् 1897 ईस्वी को के होलिका दहन के दिन अपने प्रमुख साथियों के साथ इन्होंने एक संदेश भेजा, सेनुआ में एकत्रित कर इन्होंने क्रांति की योजना से उन्हे अवगत कराया। गेमारी आंदोलन का केंद्र बन गया, धीर धीर तीर धनुष, तलवार से लैस एक बड़ी सेना बिरसा मुंडा जी ने तैयार कर ली थी। 

बिरसा मुंडा के अनुयायियों से गया मुंडा को इसके सेनापति और बिरसा मुंडा को प्रमुख मंत्री बनाया गया। बिरसा सेना के सदस्य रांची, खूंटी, बुंडू, तमाड़, कर्रा, तोरपा, बासिया, सिसई तथा चक्रधरपुर आदि क्षेत्रों में फैले हुए थे। स्वयं बिरसा मुंडा जी एक उत्साहित नेता की तरह इस सेना का प्रशिक्षण देते थे एवं संगठन देखते थे और उनका मनोबल भी बढ़ाया करते थे। उनकी सेना का मुख्यालय खूंटी में था, वास्तविक विद्रोह 25 दिसंबर सन् 1899 ईस्वी में बिरसा मुंडा आन्दोलन शुरू हुआ था। और विद्रोहियों ने संवाद मिशन होते हुए मुरहू मिशन, बोरजो मिशन पर आक्रमण किया।

तीरों से पुलिस थानों पर आक्रमण करके उनमें आग लगा दी गई, सेना से भी सीधी मुठभेड़ हुई, किन्तु तीर कमान गोलियों का सामना नहीं कर पाये, बिरसा मुंडा के साथी बड़ी संख्या में मारे गए।

एक दल ने रांची के जर्मन मिशन पर आक्रमण करने का प्रयास किया, रांची और खूंटी में बिरसा सेना के कारण आतंक छा गया था। अंग्रेजी सरकार ने विद्रोहियों के विरुद्ध युद्ध स्तर पर सैनिक कार्रवाई करने का फ़ैसला लिया और उन लोगों के विरुद्ध करवाई की गई। और अंग्रेजी सरकार ने विद्रोहियों और अनुयायियों पर गोली चलाना प्रारंभ कर दिया जिससे सैकड़ों स्त्री-पुरुष और बच्चे मारे गए। बिरसा मुंडाजी के अनुयायियों की पराजय हुई और लगभग 300 लोगों को अंग्रेजी सरकार ने बंदी बना लिया।

ब्रिटिश सरकार ने बिरसा मुंडा जी पर इनाम, बिरसा मुंडा जी की मृत्यु?

सरकार ने बिरसा मुंडा (Birsa Munda) जी को पकड़वाने वालों को ₹500 इनाम की घोषणा भी कर दी थी।

गया मुंडा पकड़ा गया और मारा गया, और वहीं वनगांव के जगमोहन सिंह के आदमियों में वीर सिंह, महली आदि ने इनाम के लालच में आकर बिरसा मुंडा जी को 3 मार्च 1900 में को पकड़वा दिया गया। बिरसा मुंडा (Birsa Munda) जी को रांची लाया गया और करीब 9 महीने तक मुकदमा का नाटक चला। मुकदमा चल ही रहा था कि 9 जून सन् 1900 को रांची जेल में ही बिरसा मुंडा जी की हैजा से मृत्यु हो गई। और उनके अनुयायियों पर भी मुकदमा चला और बहुत से लोगों को फांसी दी गई, बहुत से लोगों को आजीवन कारावास तथा कठोर कारावास की सजा दी गई मुकर्रर की गई।

कुछ रिपोर्ट के मुताबिक बिरसा मुंडा जी को जेल में जेलर ने उनके खाने में जहर देकर उसे मार दिया।

इस प्रकार द्वितीय चरण का बिरसा आंदोलन जो विशुद्ध क्रांतिकारी था समाप्त हो गया था। बिरसा मुंडा की मृत्यु के पश्चात भी आंदोलन आदिवासियों को प्रेरित करता रहा। यह आदिवासियों का प्रथम राष्ट्रीय आंदोलन था जिसने उन्हें या अनुभव कराया की आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता बेहद ही आवश्यक है। खूंटी क्षेत्र के उनके अनुयाई आज भी विश्वास करते हैं उनकी दशा सुधारने के लिए बिरसा मुंडा जी पुन: यानी फिर से जन्म लेंगे, बिरसा आंदोलन की गूंज छोटानागपुर के बाहर भी सुनाई पड़ी।

इस प्रश्न पर सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे देशभक्त काउंसिल के सदस्यों ने सरकार की कड़ी आलोचना भी की थी। कोलकाता से प्रकाशित English Man, Pioncer और Statesman (स्टेट्समैन) जैसे समाचार पत्रों में बिरसा मुंडा (Birsa Munda) जी पर किए गए अत्याचारों की भर्त्सना की गई थी। प्राय: सभी ने इसे अंग्रेज सरकार ईसाई मिशन तथा सामंत वर्ग की मिलीभगत का परिणाम बतलाया। इस विद्रोह से सबक लेकर अंग्रेजी सरकार ने छोटानागपुर में भूमि कानून तथा प्रशासनिक व्यवस्था में परिवर्तन कर आदिवासियों की स्थिति में सुधार करने का प्रयास प्रारंभ किया। और सन् 1908 ईसवी का छोटानागपुर काश्तकारी कानून इसी युद्ध प्रयास का परिणाम था।

तो कुछ इस तरह बिरसा मुंडा जी का आंदोलन का अंत हुआ लेकिन कुछ समय तक कई जगहों पर बिरसा मुंडा जी के अनुयायियों आंदोलन चलाती रही। तो किसी तरह अंग्रेजी सरकार ने धीरे-धीरे सभी को शांत कराया और आंदोलन को रुकवाया और उसके बहुत से शर्तो को अंग्रेजी सरकार ने माना भी।

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