महात्मा गाँधी का जीवनी | Great Mahatma Gandhi Biography in hindi | भारत की आजादी का इतिहास, essay, निबंध

महात्मा गाँधी का जीवन परिचय, इतिहास

क्रांतिकारी सत्यवादी महात्मा गांधी शुरू से ही सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर कायम रहने वाले शायद पहले इंसान होंगे। गांधी जी के अंदर सत्यता इतनी थी कि सबको दिख जाती थी एक पारदर्शीता की तरह। महात्मा गांधी जी जहां भी जाते थे वहाँ पर किसी तरह का अगर सामाजिक मतभेद है लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है तो महात्मा गांधी जी चुप नहीं रहते थे उसके खिलाफ बोलते थे लेकिन कुछ अलग ही तरीके से महात्मा गांधी अहिंसा तरीके से उसका विरोध करते थे, जब महात्मा गांधी साउथ अफ्रीका अपने एक दोस्त का केस लड़ने के लिए गए थे।

Mahatma Gandhi rare photo महात्मा गाँधी

तो वहाँ पर उन्होंने लोगों के साथ हो रहे हैं दुर्व्यवहार को देखा और लोगों को जागरूक किया और उसे सम्मान और प्रतिष्ठा दिलवाई। महात्मा गांधी शुरू से ही महात्मा नहीं थे बचपन में महात्मा गांधी पढ़ने में एक सामान्य बच्चे की तरह ही था। महात्मा गांधी इतने शर्माते थे कि 30 – 40 लोगों के बीच में अगर खड़ा करके कुछ बोलने के लिए कह दिया जाता था तो गांधी जी के पैर कांपने लगते थे। लेकिन धीरे धीरे गांधी जी ने अपने आप को देश के बदलते माहौल के हिसाब से ढाल लिया जो देश को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई जो अविश्वसनीय और सराहनीय था।

महात्मा गाँधी पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी
महात्मा गाँधी का जन्म दिवस 2 अक्टूबर 1869
महात्मा गांधी जी का उम्र 78 साल
महात्मा गांधी जी का जन्म स्थान पोरबंदर, (गुजरात)
महात्मा गाँधी की मृत्यु तारीख 30 जनवरी 1948
गाँधी जी का पेशा वकील, पत्रकारिता
नागरिकता ब्रिटिश राज, अधिराज्य भारत ( Dominion of India)
महात्मा गाँधी के पिता का नाम करमचंद गाँधी
महात्मा गांधी के माता जी का नामपुतलीबाई गाँधी
महात्मा गांधी जी का पत्नी का नामकस्तूरबा गाँधी
महात्मा गाँधी के बच्चे (4) हरिलाल गाँधी, मनीलाल गाँधी, रामदास गाँधी, देवदास गाँधी

महात्मा गांधी का जन्म व परिवार

महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर सन् 1869 में गुजरात के तटीय इलाका पोरबंदर (काठियावाड़) में हुआ था, महात्मा गांधी जी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। करमचंद गांधी इनके पिताजी का नाम था, महात्मा गांधी के पिताजी करमचन्द गान्धी ब्रिटिश हुकुमत के समय के काठियावाड़ के छोटे से रियासत के दीवान (Minister) हुआ करते थे। गांधी जी के माता जी का नाम पुतलीबाई थी जो एकदम आध्यात्मिक धार्मिक रीति रिवाजों को माननी वाली थी। जिसका प्रभाव गांधी जी पर भी पड़ा, इनकी माँ अक्सर पूजा पाठ करती रहती थी।

Mahatma Gandhi rare photo

महात्मा गान्धी जी का शादी मात्र 13 साल की उम्र में सन् 1882 में कस्तूरबा गांधी से कर दी गई थी जिसकी उम्र 14 साल थी। दो साल बाद 1885 में महात्मा गांधी जी का पहला सन्तान का जन्म हुआ था, लेकिन अफसोस वो बच्चा ज़्यादा दिन तक जिंदा नहीं रहे, उनकी मृत्यु हो गई। गांधी जी के पिताजी का भी उसी साल में निधन हो गया था, फिर कुछ सालो के बाद गांधी जी के एक एक करके 4 संतानों का जन्म हुआ। जो इस प्रकार हैं – हरीलाल गान्धी (1888), मणिलाल गान्धी (1892), रामदास गान्धी (1897) और देवदास गांधी (1900).

महात्मा गांधी का शिक्षा और कार्य

महात्मा गाँधी जी का सेकेंडरी स्कूल तक कि पढ़ाई पोरबंदर में ही हुई थी, इंटरमीडिएट की पढ़ाई राजकोट इन्होंने की। मैट्रिक की परीक्षा इन्होंने साल 1887 में अहमदाबाद से पास की थी, उसके बाद महात्मा गांधी जी शामलदास कॉलेज आर्ट्स, भावनगर (गुजरात) में दाखिला लिया। लेकिन घर के लोगों से दूर रहने के कारण अक्सर तबीयत खराब रहती थी तत्पश्चात कॉलेज छोड़कर गांधी जी पोरबंदर वापस चले आए। साल 1888 में गांधी जी कानून (बैरिस्टर/वकील) की पढ़ाई करने के लिए लंदन (इंग्लैंड) के यूनिवर्सिटी चले गए।

लंदन में पढ़ाई के दौरान महात्मा गाँधी जी को बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। गांधी जी शाकाहारी भोजन खाते थे और गांधी जी वहां के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, कहाँ शाकाहारी भोजन मिलता है। शुरू में कठिनाइयां तो आई लेकिन धीरे धीरे वहाँ के बारे सब जान गए कि कहाँ शाकाहारी भोजन मिलता है। पढ़ाई पूरा होने के बाद महात्मा गांधी जी वापस हिन्दुस्तान लौटे, लौटने के बाद गांधी जी को पता चला कि उनकी माँ अब इस दुनिया में नहीं रही। उसके बाद मुंबई में अपनी वक़ालत शुरू की लेकिन बाद में किन्ही कारणों से राजकोट चले गए।

राजकोट में गांधी जी जरूरतमन्दों लोगों के लिए मुकदमे की अर्जियाँ लिखने का काम आरंभ किया लेकिन कुछ समय पाश्चात ये काम भी गांधी जी को रास नहीं आई और काम छोड़ दिया।

महात्मा गाँधी जब केस लड़ने साउथ अफ्रीका गए

गांधी को एक केस के सिलसिले में एक पत्र मिला जो साउथ अफ्रीका से आया था। वहाँ एक गुजराती व्यापारी हुआ करता था जिसका नाम दादा अब्दुल्ला था बात 1905-1906 की थी और वो गुजराती व्यापारी बहुत परेशान था। महात्मा गाँधी भी यहां खाली बैठा हुआ था, गांधी जी की आर्थिक स्थिति बेहद ही खराब हो चुकी थी। तो उस गुजराती व्यापारी ने महात्मा गाँधी को अपने कुछ केस लड़ने के लिए एक साल के agreement के साथ साउथ अफ्रीका बुलाया। दादा अब्दुल्ला को व्यापार में बहुत हानि हो चुकी थी तो गाँधी जी केस लड़ने के लिए तैयार हो गए।

महात्मा गाँधी के साथ अंग्रेजो का दुर्व्यवहार करना

गुजराती व्यापारी दादा अब्दुल्ला ने महात्मा गाँधी जी की 1st Class में टिकट करा दी। और जब महात्मा गाँधी 1st Class में सफर कर रहे थे तब वहां पर साउथ अफ्रीका के अंग्रेजो को बहुत ख़राब लगा कि ये काला आदमी कैसे 1st Class के डिब्बा मे चढ़ गया। साउथ अफ्रीकन अंग्रेजन कहा चल बाहर निकल यहाँ से उसके बाद महात्मा गाँधी को उस डब्बे से बाहर निकाल देता है। इससे महात्मा गाँधी को बहुत बुरा लगता है लेकिन महात्मा गाँधी कुछ नहीं बोले, और जब कोर्ट में केस लड़ रहे थे तब वहां के जज ने भी गुस्से में कहा की अपनी गुजराती पगड़ी नीचे उतारो।

तो यहाँ पर चुपचाप महात्मा गाँधी ने अपनी पगड़ी भी उतार दी, फिर भी उसके बाद महात्मा गाँधी वहीं रहे क्योंकि दादा अब्दुल्ला के साथ एक साल का कॉन्ट्रैक्ट था। और लगातार गांधी जी के साथ दुर्व्यवहार होता रहा वो सहते रहे कई बार बेइजती हुई वो भी सहता रहा। इसके पीछे वजह क्या थी? इसके 2 मुख्य कारण थे एक आर्थिक तंगी थी दूसरा एक साल तक का agreement था कि दादा अब्दुल्ला के साथ रह कर उनके केस लड़े।

साउथ अफ्रीका में गांधी ने भेदभाव, रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाई

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे और अत्याचार और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। इस तरह के भेदभाव और अन्याय को देखने के बाद महात्मा गाँधी जी को बहुत ही खराब लगा कि ये लोग भारतीयों के साथ ऐसा कैसे कर सकता है। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गाँधी जी ने भारतियों को अपने सामाजिक और राजनैतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। गांधी जी ने भारतियों की नागरिकता से सम्बंधित मुद्दो को दक्षिण अफ्रीकी सरकार के समक्ष रखा।

एक साल का कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने के बाद महात्मा गाँधी जी हीरो बनके उभरे और पहली बार साउथ अफ्रीका में ही सविनय अवज्ञा आन्दोलन (Civil Disobedience movement) शुरू किया। उसके बाद पूरी दुमिया ने महात्मा गाँधी की तारीफ की उसके बाद गोपाल कृष्ण गोखले ने महात्मा गाँधी को वापस भारत बुलाया और कहा की तुम भारत में आकर हमारे आंदोलन को लीड करो।

महात्मा गाँधी जब साउथ अफ्रीका से भारत लौटे

जब महात्मा गाँधी सन् 1915 में भारत वापस लौटे तो महात्मा गाँधी पूरे देश का पहले दौरा करके जायजा लिया। गांधी जी पाया कि किसानों और मजदूरों से बहुत ज्यादा भूमि कर (Land tax) ले रहा है और साथ में भेदभाव भी किया जा रहा है। इसके बाद 9 जनवरी 1915 को महात्मा गाँधी वापस भारत आये, और गांधी का वापस आने की खुशी में भारत में हर 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

1917 का चम्पारण सत्याग्रह आंदोलन क्या था? किसने शुरू किया था?

चम्पारण सत्याग्रह बिहार के चम्पारण जिले से महात्मा गाँधी ने शुरू किया था। जहां पर ब्रिटिश हुकुमत किसानों से जोर जबरदस्ती और अपनी ताकत से नील की खेती करने पर मजबूर कर रहे थे। जिस वजह से वहाँ के किसान अंग्रेजो से बहुत ज्यादा तंग हो गए थे, नील की खेती करने से अधिकांश जमीन खराब हो जाती थी उसपर कोई दूसरी फसल भी नहीं होती थी। और ज्यादा समय अंगेज किसानों से सिर्फ नील की खेती करवाते थे जिसके कारण किसान कोई दूसरी फ़सल की बुआई नहीं कर पाते थे। गांधीजी के नेतृत्व में भारत में किया गया यह पहला सत्याग्रह आंदोलन था।


तीन कठिया कानून पद्धति क्य़ा था?

चम्पारण के तीन कठिया (3/20) कानून पद्धति को महात्मा गांधी ने कैसे खत्म कर दिया?

दरअसल चम्पारण सत्याग्रह को ही तीन कठिया कानून पद्धति के नाम से जाना जाता है।
तीन कठिया कानून पद्धति में 3/20 जमीन के हिस्से में यानी जिसके पास भी करीब 20 कठा जमीन था उसमे से 3 कठा जमीन पर जोर ज़बरदस्ती से अंग्रेज नील की खेती करवाती थी। नील वो होता जो कपड़ों पर चढ़ाया जाता है नील की खेती से किसानों की खेत बंजर होती जा रही थी। नील की खेती करने से जमीन की उर्वरता खत्म हो जाती थी जिसके कारण कोई दूसरी फ़सल नहीं हो पाती थी। तो यहां महात्मा गांधी ने अंग्रजी हुकुमत के खिलाफ आवाज उठाई आंदोलन किए तब जाकर कहीं इस तीन कठिया कानून पद्धति को खत्म किया गया था।

महात्मा गाँधी दिसंबर 1916 में कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लेने के लिए लखनऊ गए। इसी अधिवेशन में चम्पारण के साहूकार राज कुमार शुक्ला व संत राउत लखनऊ में जाकर महात्मा गाँधी जी से मुलाकात की। और महात्मा गांधी जी को चम्पारण के किसानों की हालातों और उन पर हो रहे अत्याचारों के बारे में बताया। महात्मा गांधी शुरू में तो राज कुमार शुक्ला के साथ चम्पारण आने से मना करते रहे क्योंकि गांधी जी को गोपाल कृष्ण गोखले ने मना किया था कि भारत लौटने के बाद एक साल तक किसी भी तरह का आंदोलन नहीं करना है।

तो उस समय राज कुमार शुक्ला के साथ चम्पारण नहीं गए उसका कारण ये था।

लेकिन यहां राज कुमार शुक्ला अपनी जिद्द पर अड़े रहे और महात्मा गांधी जी को चम्पारण आने के लिए मजबूर कर दिया। महात्मा गाँधी जी ने राज कुमार शुक्ला से कहा ठीक है फ़िलहाल तो मैं नहीं आ सकता हूँ लेकिन कोलकाता के दौरे के बाद मैं अपने सहयोगियों के साथ चम्पारण (बिहार) जरूर आऊंगा। लेकिन राज कुमार शुक्ला को महात्मा गांधी जी की बातों पर विश्वास ही नहीं था, कि वो कभी चम्पारण आयेंगे इसके लिए राज कुमार शुक्ला महात्मा गांधी जी के साथ कोलकाता के दौरे पर चले गए।

राज कुमार शुक्ला किसी भी परिस्थिति में गांधी जी को चम्पारण लेकर ही जाना चाहते थे। क्योंकि राज कुमार शुक्ला और उसके गांव के लोग ब्रिटिश की जोर जबरदस्ती से बहुत ज्यादा तंग हो गए थे और इससे सिर्फ गांधी जी ही छुटकारा दिलवा सकते थे। 10 अप्रैल 1917 को गांधी जी अपने कुछ साथियों के साथ चम्पारण पहुंचते हैं जिसमें राजेन्द्र प्रसाद, नारायण सिन्हा, रामनाथवी प्रसाद, ब्रज किशोर प्रसाद आदि लोग शामिल थे। उसके बाद गांधी जी ने वहाँ कई क्षेत्रों का दौरा किया और किसानों से बातचीत की। जिससे गांधी जी को पता चला कि अधिकांश लोग तो पढ़े लिखे ही नहीं है

जिसके कारण वहाँ के ज़मींदार उसका फायदा उठाते हैं, चम्पारण की खराब स्थिति को सुधारने के लिए महात्मा गाँधी जी ने अपने साथियों और वकीलों के साथ मिलकर चम्पारण की स्थिति को रास्ते पर लाने के लिए जुट गए। साथ में कुछ और नेता गांधी जी की मदद करने के लिए आगे आए जिनमे से एक थे पंडित जवाहरलाल नेहरू जी। गांधी जी जब चम्पारण में सत्याग्रह कर रहे थे तब चम्पारण जिले के मजिस्ट्रेट ने महात्मा गांधी जी को एक नोटिस भेजा। जिसमें मजिस्ट्रेट ने कहा आप यहां नहीं रह सकते हैं आप यहां से चले जाए तो ये आपके लिए बेहतर होगा।

गांधी जी जाने से मना कर दिया जिसके बाद महात्मा गाँधी को अदालत में पेश होने को कहा गया। और साथ में मजिस्ट्रेट ने एक नोटिस में कहा कि अगर आप चम्पारण छोड़ कर चले जाए तो आप दर्ज सारे केस वापस ले लेंगे। महात्मा गांधी जी मजिस्ट्रेट को जवाब में लिखता है कि मैं यहाँ मानवता के नाते आया और लोगों के मदद भाव से आया। मैं जब तक इन लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं कर देता, फ़िलहाल मैं चम्पारण से नहीं जानेवाला। मजिस्ट्रेट की बात ना मानने पे गांधी जी को लोगों को भड़काने और उनके बीच अशांति फैलाने के जुर्म में गांधी जी को गिरफ़्तार कर लिया।

चम्पारण के किसानों को जब पता चला कि महात्मा गाँधी जी को गिरफ़्तारी कर लिया गया तो उस थाने और अदालत के बाहर किसानों ने धरना प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। जिसके बाद मजबूरन महात्मा गांधी को छोड़ना पड़ा। उसके बाद चम्पारण सत्याग्रह धीरे धीरे बढ़ता गया अंग्रेजो को आखिरकार उसकी बात माननी ही पड़ी और फिर उसके बाद कृषि समिति का गठन किया गया जिसके अंतर्गत किसानों की समस्याओं का समाधान किया जाने लगा और महात्मा गांधी को भी कृषि समिति का सदस्य बनाया गया। तो इस तरह गांधी जी की भारत में पहला सत्याग्रह सफल रहा।

1919 का खिलाफत आंदोलन क्या था? कहाँ किसने शुरू किया था?

खिलाफत आन्दोलन को किसने शुरू किया था? खिलाफत आन्दोलन होने का मुख्य कारण टर्की के एक धर्मगुरु से शुरू हुआ था। दरअसल हुआ ये था कि टर्की के एक बड़े धर्मगुरु जिसका नाम खलीफा था अंग्रेजों ने उसके पद से जोर जबरदस्ती से हटा दिया था। जिसके कारण करीब दुनिया भर के मुस्लमान जो उनको एक धर्मगुरु का दर्जा दिए थे उनको अपना आदर्श धर्मगुरु मानते थे। सब मुसलमान एकजुट होकर जगह जगह खिलाफत आन्दोलन शुरू कर दिया। तो यहाँ गाँधी जी ने सोचा मैं तो मुस्लिम नहीं हूँ लेकिन देश की आजादी के लिए लोगों की एकजुटता जरूरी है।

खिलाफत आन्दोलन 1919 से लेकर 1924 तक चला।

खिलाफत आन्दोलन के माध्यम से कांग्रेस के अन्दर और मुस्लिमों के बीच अपनी लोकप्रियता और अपना प्रभुत्व स्थापित करने का एक अच्छा अवसर मिल चुका था।

खिलाफत आन्दोलन से महात्मा गाँधी को एक आयडिया आया, क्यों न मैं इसके खिलाफत आन्दोलन मे शामिल होकर इसकी मदद करूँ। जिससे देश के मुसलमानों को एकजुट करना और भी आसान हो जाएगा, देश की आजादी लिए सभी समुदायों के लोगों को साथ लेना बहुत जरूरी है। तो उसके लिए उसका दिल जितने के लिए महात्मा गाँधी खिलाफत आन्दोलन मे बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। उसी दरमियान साउथ इंडिया में 1921 में मुस्लिमों द्वारा करीब 1500 हिन्दुओ को मार दिया गया। और करीब 2000 हिन्दुओ को जबरदस्ती धर्म परिवर्तन भी कर दिया गया।

जब जबरदस्ती हिन्दुओ का धर्म परिवर्तन किया जा रहा था, उस वक्त महात्मा गाँधी मुस्लिम के खिलाफ कुछ नहीं बोला। क्योंकि उस वक्त वो मुसलमानों का दिल जितना चाहते थे और एकजुट करना चाहते थे। इससे सारे हिन्दू बहुत गुस्सा भी हुए महात्मा गाँधी कुछ क्यों नहीं बोल रहे हैं? यहां जबरदस्ती हिन्दुओ का धर्म परिवर्तन किया जा रहा है ये तो गलत है। लेकिन गाँधी जी यहाँ तो मुसलमानों को एकजुट करना चाहते थे ताकि देश की आजादी में मेरी मदद कर सके। महात्मा गाँधी ने यहाँ देश की आजादी के लिए 2000 हिन्दुओ को महत्त्व नहीं दिया।

भारत में खिलाफत आन्दोलन का नेतृत्व आल इंडिया मुस्लिम कांफ्रेंस’ द्वारा किया जा रहा था। धीरे-धीरे महात्मा गाँधी जी इसके मुख्य प्रवक्ता बन गए थे। भारतीय मुसलमानों के साथ एकजुटता बनाने के सम्बंध में अंग्रेजों द्वारा दिए सम्मान और मेडल गांधी जी ने वापस कर दिया था। इसके बाद गाँधी जी न सिर्फ कांग्रेस के बल्कि देश के एकमात्र ऐसे नेता बन गए थे जिसका प्रभाव हर समुदायों के लोगों पर हो गया था।

1920 का असहयोग आन्दोलन (Non-cooperation movement) क्या था?

असहयोग आन्दोलन (Non-cooperation movement ) – 1920 के बाद महात्मा गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन शुरू किया ये एक बड़ा आन्दोलन था। लेकिन यहां महात्मा गांधी जी को अपनी एक गलती का एहसास होता है कि कितना बड़ा गलती कर चुके हैं। महात्मा गांधी जी ने कह तो दिया था कि हमलोग अंग्रेजों का किसी भी तरह से उसके कामों में हाथ नहीं बढ़ायेंगे और ना ही उसके किसी भी चीज़ का ईस्तेमाल करेंगे। सीधी बात यह थी की हम अंगेजो का किसी भी तरह से सहयोग ही नहीं करेंगे तो फिर वो काम किससे करवाएगा।

मोतीलाल नेहरु, पंडित जवाहरलाल नेहरु, चितरंजन दास, सरदार वल्लभभाई पटेल ये उस समय के बहुत बड़े वकील हुआ करते थे। इन्होने कोर्ट में जाना छोड़ दिया अब सब स्वदेशी चीजे बनायेंगे और इस्तेमाल करेंगे खुद चरखा चलाएंगे और कपड़े बनायेंगे।

कोई कर नहीं मिल रहा था उसके collage में कोई नहीं जा रहा था, बहुत से विद्यापीठ खुलने लगे गुजरात विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, काशी विद्यापीठ, बंगाल राष्ट्रीय यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी आदि। भारतीय लोगो को अपना स्कूल खोलने तक प्रावधान नहीं था लेकिन महात्मा गांधी ने उसके विरुद्ध जाकर बहुत से स्कूल का निर्माण करवाया।

अंग्रेज यहाँ क्यों आये थे पैसा कमाने और शक्ति लेने के लिए इसमें ये था की आप अंग्रेजो का सहयोग ही मत करो यहाँ अंग्रेज क्यों आये थे पैसा कमाने और पॉवर लेने। महात्मा गाँधी ने कहा इसका पैसा खत्म कर दो जहाँ जहाँ से ये पैसे कमाते हैं, सब अपना करेंगे कपड़े, स्कूल, कॉलेज, वर्कर स्ट्राइक उसकी सरकार की स्थिति ही ख़राब कर दो। तो इस असहयोग आन्दोलन से ब्रिटिश सरकार को थोड़ी बहुत नुकसान तो हुई, लेकिन असहयोग आन्दोलन से अंग्रेजो पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा उनका अभी बहुत सा काम चल रहा था।

महात्मा गाँधी को लगा कि अंग्रेजों का असहयोग करने से अंग्रेज भारत छोड़ के भाग जायेंगे क्योंकि बाकि के जितने भी मैंने आन्दोलन किये सब सफल रहा मैंने अंग्रेजो को हरा दिया है। लेकिन महात्मा गांधी जी की ये रणनीति सफल नहीं हुई महात्मा गांधी ने लोगो से कहा था अगर तुम लोगों ने मेरी मदद की तो मैं तुम्हे एक साल में आजादी दिला दूंगा। लोगों को भी लगा की चलो 1921 में हमलोगों को अंग्रेजों से आजादी मिल जाएगी। लेकिन यहाँ 1922 आ गया आजादी नहीं मिली अब गाँधी जी को लगा की मेरा प्लान तो असफल हो गया।

लेकिन बाद में महात्मा गाँधी को पता चला की लेकिन यहाँ अंग्रेज फिर भी भारत से बहुत सी चीजो को बाहर निर्यात कर रहे थे यानि बड़े आसानी से सामानों को बेच रहे थे खनिज पदार्थ मसाले आदि। अब इसके बाद महात्मा गाँधी बहाना खोजने लगे कि किसी तरह अब इस आंदोलन को बंद करना है क्योंकि इससे कोई फायदा नहीं रहा था।

1922 का चौरी चौरा कांड क्या था?

5 फरवरी 1922 की बात थी उस समय लोग भी बहुत गुस्से में थे, चौरी चौरा जो गोरखपुर के पास है जहाँ लोग आन्दोलन कर रहे थे। वहां पर पुलिसवाले ने लोगो पर लाठी चार्ज कर दिया लोग भी वहां भारी मात्रा में थे तो गुस्से में आकार लोगो ने पुलिसवाले को मारने लगा और पुलिस वाले भागकर अपने पुलिस लोकप में अन्दर से लॉक कर लिया। पुलिस वाले अब कह रहे अब मारो तो भारतीय तो भारतीय होते होते हैं उसने बाहर से लॉक कर दिया और उसके ऊपर केरोसिन तेल छिड़क कर जिन्दा आग दिया। जिसमे 22 पुलिसवाले जिन्दा जलकर मर गए।

अब अंग्रेजो को भी बहाना मिल गया था वो चाहते थे महात्मा गाँधी जी को गिरफ्तार कर सकते थे क्योंकि गाँधी जी उस आन्दोलन के मुखिया थे। लेकिन यहाँ अंग्रेज महात्मा गांधी जी गिरफ्तार नहीं कारते हैं उन्हें पता था की अगर मैंने महात्मा गांधी जी को गिरफ्तार किया तो लोग और भी उग्र हो जायेंगे। महात्मा गांधी शुरू से नरम दल वाले थे और यहाँ एक गलती कर दी और गाँधी जी ने कहा कि हम आन्दोलन वापस ले रहे हैं। और जो लोग गाँधी जी के साथ थे आन्दोलन वापस लेने के बाद वही लोग अब गाँधी जी के खिलाफ हो गई।

जब लोगो ने महात्मा गाँधी जी पूछा कि आप आन्दोलन वापस क्यों ले रहे है तो महात्मा गांधी ने कहा आप लोगों ने बहुत गलत किया। तो लोगो ने भी कहा शुरुआत पहले उसने किया था हमलोग तो वहां चुपचाप प्रदर्शन कर ही कर रहे थे पुलिसवाले ने लोगो पर बेवजह लाठी चार्ज कर दिया तो भला हमलोग कब तक चुप रहते। और कुछ दिन के बाद ही महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया। महात्मा गाँधी ने कहा मैं देश को अहिंसा तरीके से आजाद कराना चाहता हूँ, पर यहाँ तुम लोगो ने इतने पुलिकर्मी को मार दिया।

228 लोगो को कोर्ट ले जाया गया 172 लोगो को death penalty दी गई और करीब 40 लोगो को को सजा हुई। और उस समय ब्रिटिश सरकार भी लोगों को मारने के लिए अपनी फौज तैयार कर के बैठी थी। अंग्रेजों ने मार्शल लो लगा दिया मतलब कि जहां कहीं भी कोई भारतीय दिखे उसे वहीं गोली मार दो।

जो अहिंसा आन्दोलन उग्र होता है वो आन्दोलन कभी भी सफल नहीं हो सकता है, ऐसा महात्मा गांधी ने लियो टाल्सटाय की किताब में पहले ही पढ़े चुके थे। तो यहाँ महात्मा गाँधी ने कहा An Eye for an Eye makes the whole world blind. यानि गर किसी ने तुम्हारी आंख फोड़ी तुमने उसकी आँख फोड़ी तो ऐसे दुनिया पूरी अंधी हो जाएगी। महात्मा गांधी के ऐसा करने से बहुत से लोगों ने पसंद नहीं किया लोग बहुत गुस्सा भी हुए। जब बहुत तादात में लोग गाँधी जी को कोसने लगे बहिष्कार करने लगे तो यहाँ अंग्रेजो को बहुत अच्छा मौका मिल गया गाँधी जी को गिरफ्तार करने के लिए।

अंग्रेज महात्मा गांधी को गिरफ्तार करके जेल में बंद कर दिया था, जमुना लाल बजाज जिसको गांधी का पांचवा पुत्र माना जाता था वो sponsor किया करते थे। उन्होंने खादी उद्योग, स्कूल, कॉलेज में काफी पैसा खर्च किया था, वो सब बंद हो गया था जमुना लाल बजाज ने कहा कि गलत किया आपने और वहाँ भगत सिंह भी अपने टीम के साथ महात्मा गांधी जी की मदद करना चाहते थे। क्योंकि भगत सिंह असहयोग आंदोलन से जुड़ चुके थे और महात्मा गांधी के विचारो से प्रभावित भी थे, उनकी विचारो से एक समय भगत सिंह सहमत थे।

लेकिन यहां असहयोग आंदोलन वापस ले लेने के बाद भगत सिंह का दिल टूट चुका था, कुछ समझ में नहीं आ रहा था, क्या करे?

दांडी मार्च क्या थी?

दरअसल अंग्रेजो ने उस वक्त नमक पर कई हजार गुणा टैक्स लगा दिया था जिससे नमक के दाम बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। तो गाँधी जी ने कहा की नमक तो प्राकृतिक है आप उतना टैक्स कैसे लगा सकते हैं? लेकिन अंग्रेजो के कानो में जूं तक नहीं रेंगी। उसके बाद महात्मा गाँधी ने कहा की हमलोग खुद जाकर नमक बना लेंगे इसके लिए महात्मा गाँधी दांडी मार्च निकाला। महात्मा गाँधी जी द्वारा चलाया गया ये अभियान जिसमे महात्मा गाँधी दांडी तक 28 दिनों तक पैदल यात्रा करके पहुँचते हैं और खुद से नमक बनाने की शुरुआत करते हैं।

महात्मा गाँधी जी ने कहा कि मेरे साथ सिर्फ 79 लोग ही आएंगे, चौरी चौरा कांड होने के बाद से महात्मा गांधी दोबारा किसी बड़े कांड नहीं होने देना चाहते थे। और 79 लोगों का महात्मा गांधी ने खुद चुना था सबका इंटरव्यू तक खुद लिया और पूछा कि तुम मार खाने के लिए तैयार हो। कुछ बता नहीं सकते हैं कि हमलोग ज़िन्दा भी वापस आयेंगे भी कि नहीं, बहुत पिटाई होनेवाली है। तभी इस दांडी मार्च में जा सकते हो, लेकिन लोग मरने के लिए तैयार थे और निकल पड़े दांडी मार्च के लिए।

12 मार्च 1930 को साबरमती से शुरू हुई ये दांडी मार्च यात्रा कई दिनों तक चली करीब 28 दिनों तक और करीब 358 km तक महात्मा गाँधी और उसके सहयोगी पैदल चले। इस बीच में महात्मा गांधी और उनके लोग भी बहुत पीटे फिर भी महात्मा गाँधी जी नहीं रुके चलते रहे फिर क्या हुआ रास्ते में और भी बहुत से लोग जुड़ते गए और जुड़ते जुड़ते करीब 20,000 लोग जुड़ गए। और इन लोगों ने भी कहा हमे भी मारो, दांडी मार्च में चले थे 79 लोग वहां हो गए 20000 लोग और पहुँच कर गाँधी जी ने खुद से नमक बनाया।

गांधी इरवीन पैक्ट क्या थी? गांधी इरविन समझौता  

ये वो गाँधी इरवीन समझौता था जिसके कारण भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को फांसी भी दी गई, और महात्मा गांधी ने बचाया तक नहीं, चूँकि खुद महात्मा गाँधी जी एक वकील थे। 

उस समय वायसराय इरवीन थे उनको महात्मा गांधी ने मनवा (convene) लिया था और कहा कि हम लोग आपके साथ हाथ जोड़ कर लड़ रहे हैं, आप पर हाथ तक नहीं उठा रहे हैं तंग नहीं कर रहे हैं कुछ नहीं कह रहे हैं। जो लोग अहिंसा तरीके से आंदोलन कर रहे हैं उसे तो आप जेल में नहीं डालो वायसराय लार्ड इरवीन मान गाँधी जी की इस बात को मान जाते हैं। कहा ठीक अहिंसा वालों को हम जेल में डालेंगे लेकिन उसका क्या करूं भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को इन्होंने तो सांडर्स की हत्या की हैं।

तो यहां महात्मा गांधी क्या कहते पता है आपको महात्मा गांधी कहते हैं, आपको जैसा ठीक लगता है उसके साथ वैसा ही आप करे। महात्मा गांधी ने भगत सिंह को बचाया नहीं, उनको फांसी की सजा सुना दी गई और महात्मा गांधी ने एक प्रयास तक नहीं किया जब कि गाँधी जी के पास मौका था। महात्मा गांधी चाहते तो 100 प्रतिशत भगत सिंह को बचा सकते थे ये उसके हाथ मे था। महात्मा गांधी जी ने यहां कहा कि मेरी वायसराय से पहले ही बात हो चुकी है कि जो बिना हिंसा के लड़ेंगे उसी को हम बचाएंगे इसको लेकर सुभाष चंद्र बोस और बहुत से लोग गुस्सा और नाराज भी हुए।

महात्मा गांधी ग़र चाहते तो भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को बचा सकते थे, लोग महात्मा गांधी के इस फैसले से बहुत ही गुस्से में थे। महात्मा गांधी ने कहा कि ये मेरे agreements और term में नहीं आता है मैं उन्हीं लोगों को बनाऊँगा जो मेरे मुताबिक चलेगा। 

कुछ इतिहासकारों के अनुसार इरवीन ने तो ये तक कह दिया था कि अगर महात्मा गांधी ये commitment दे दे कि भविष्य में भगत सिंह कुछ ऐसा नहीं करेंगे तो मैं भगत सिंह और उसके साथियों को छोड़ दूँगा। लेकिन कहा नहीं भईया मैं आदर करता हूँ उसकी बहादुरी की लेकिन मनालोगो से गुजारिश करता हूँ कि कोई भी हिंसा न करे। क्या पता आगे चलकर भगत सिंह बदले या ना बदले ये उसकी फितरत बन गई हो, कुछ कह नहीं सकते तो इसलिए मैं भगत सिंह का साथ नहीं दूँगा इस समय। 

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि महात्मा गांधी चलो ठीक है भगत सिंह को रिहा मत करवाओ लेकिन फांसी की सजा तो माफ करवा सकते थे। उसको फांसी की जगह 10 साल 20 साल सजा ही दिलवा सकते थे ये उसके हाथ में था, लेकिन फिर भी महात्मा गांधी नहीं माने और चुपचाप गोलमेज सम्मलेन में शामिल होने के लिए ब्रिटेन चले गए। महात्मा गाँधी चाहते तो सबको रिहा करके और भगत सिंह को अपने साथ गोलमेज में भी जा सकते थे लेकिन महात्मा गाँधी ने ऐसा नहीं किया। गाँधी जी ने यहाँ बहुत बड़ी गलती की ऐसा बहुत से लोग आज भी मानते हैं।

महात्मा गाँधी के गोलमेज सम्मलेन में जाने के बाद गाँधी जी के खिलाफ जगह जगह गाँधी जी का बहिष्कार किया जा रहा था। और अगर कहीं गाँधी जी किसी काम से जाते भी तो लोग गाँधी वापस जाओ गाँधी वापस जाओ के नारे तक लगाते।

और 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी दे दी गई और महात्मा गांधी जी ने कुछ नहीं किया। देश के लोगों ने फांसी के खिलाफ कई सारे आंदोलन किये, लेकिन यहां पर भी अंग्रेज सरकार अपने हरामीपन्ना से बाज नहीं आया और 24 मार्च को फांसी मुक़र्रर की गई थी लेकिन देश के लोगों को भगत सिंह के प्रति प्यार और उसके फांसी से बहुत ज्यादा ही नाखुश थे। लोग सड़को हर दिन प्रदर्शन कर रहे थे और दिन बा दिन इसकी संख्या बढ़ती ही जा रही थी ये सब देखकर अँग्रेजी सरकार को डर था कहीं दंगा ना हो जाए।

और 24 मार्च 1931 को कहीं दंगा भड़क गया और फांसी को कहीं रोकना न पड़ जाये इसलिए फांसी 23 मार्च 1931 की रात को ही दे दी गई। 

महात्मा गाँधी जी की कुछ अनुसुनी कहानी

उस समय कॉंग्रेस पार्टी बन चुकी थी और बड़ी पार्टी भी थी बहुत सी प्रांतीय चुनाव (Provincial election) हुए कई राज्यों में जिसमे कॉंग्रेस जीतती गई। और जो मुस्लिम लीग थी वो हारती जा रही थी, कॉंग्रेस बड़ी पार्टी बन चुकी थी अब उसमे भ्रष्टाचार (corruption) भी आ चुका था घपले पे घपले हो रहे थे। तो लोगों ने महात्मा गांधी से कहा कि आपके पार्टी में भ्रष्टाचार (corruption) आ गया है। तो महात्मा गांधी ने बड़ी शांति स्वभाव से कहा कि चलो ठीक है इस कॉंग्रेस को जमीन में दफन कर देते हैं पार्टी को ही खत्म कर देता हैं।

सरदार वल्लभभाई पटेल और पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी समझाया कि इस पार्टी को अब बंद कर देना चाहिए। इसमे भ्रष्टाचार (corruption) आ गया है, तो यहां नेहरू पटेल ने कहा नहीं गांधी जी, अगर अभी हमने कुछ ऐसा किया तो फिर मुस्लिम लीग आगे निकल जाएगी। तो इसमे corruption है उसका क्या होगा तो नेहरू ने कहा कि अभी ऐसे ही चलने देते हैं नहीं तो पूरे देश टूट जाएगा मुस्लिम लीग आगे निकल जाएगी। उसके बाद नेहरू के डटे रहने पर महात्मा गांधी कहा ठीक है जैसा करना है करो। 

महात्मा गांधी ने कहा कि चलो आजादी हो जाएगी तो फिर से तोड़कर पुनः नए सिरे से पार्टी बनायेंगे ठीक है नेहरू जी मान गए।

World War 2 में महात्मा गांधी ने अंग्रेज की मदद क्यों की?

World War 1 मे भी भारत का योगदान था, world war 2 में महात्मा गाँधी के योगदान से सुभाष चंद्र बोस, पटेल जी और बहुत से अन्य लोग इसके खिलाफ थे। लेकिन महात्मा गांधी नहीं माने और महात्मा गांधी अंग्रेज को World War 2 मदद करते हैं। सुभाष चंद्र बोस और पटेल और अन्य लोग ने भी कहा जो हमे कूट रहा पिट रहा है मार रहा है हम उसी की लड़ाई में मदद करे। ये कैसे संभव हो सकता है ये तो असंभव है, ये उसकी लड़ाई है वो अपना समझे हम उसमे अपनी जान क्यों दे। महात्मा गांधी भी अंदर अंदर से इस चीज से खुश नहीं थे। 

लेकिन महात्मा गांधी जी ने अंग्रजो से कहा था कि अगर हम आपकी युद्ध में मदद करेंगे तो आप हमारे देश के छोड़ कर चले जाएंगे। तो यहां अंग्रेजो ने भी कहा कि ठीक है अगर तुमने हमारी मदद की तो आगे चलकर हम तुम्हें आजादी दे देंगे। तो यहां गांधी सहमत हो जाते हैं और लोगों से कहा कि अगर इसकी मदद करेंगे तो ये हमे आजादी दे देंगे ऐसा अंग्रेजो ने हमे वचन दिया है। 

गाँधी जी ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु को ही क्यों बनाया?

महात्मा गांधी ने देश के प्रधानमंत्री बनाने के लिए पंडित नेहरू को चुना लेकिन देश के लोगों ने वोट सरदार वल्लभभाई पटेल जी को दिया। 2nd world War के बाद अंग्रेज बहुत कमजोर पड़ चुके थे, इतना कमजोर हो गया कि कहा ठीक है हम भारत छोड़ के जा रहे हैं। अंग्रेजो ने कहा ठीक तुम लोग अपनी अंतरिम सरकार बना लो, वोट करा लो जिसमें नेहरू, थे पटेल थे ,आचार्य कृपलानी थे, राजेंद्र प्रसाद थे, अब्दुल गफ्फार खान थे लेकिन सारा वोट सरदार पटेल के पक्ष में गया 15 प्रांतीय कमेटी थी।

फिर भी महात्मा गांधी ने सरदार पटेल को मना कर दिया की तुम पीछे हट जाओ तुम इस्तीफा दे दो, नेहरू को प्रधानमंत्री बनने दो कॉंग्रेस को जो अध्यक्ष होगा वही प्रधानमंत्री होगा लोगों ने पूछा कि आपने नेहरू को प्रधानमंत्री क्यों बनाया? तो महात्मा गांधी ने कहा कि कहीं नेहरू नाराज न हो जाए, और अगर नेहरू नाराज हो गया तो कहीं कॉंग्रेस पार्टी ही ना तोड़ दे। और कहीं कॉंग्रेस टूट गया तो अंगेज फिर से कब्जा न कर ले, उसे अंग्रेजी अच्छी आती है नेहरू विदेशी मामले अच्छे से संभाल सकता है और ऐसा कह कर नेहरू को आगे ले आता है। 

महात्मा गाँधी ने सुभाष चंद्र बोस से इस्तीफा क्यों माँगा?

सुभाष चंद्र बोस चुनाव में जीत चुके थे यहां सुभाष चंद्र बोस का मुकाबला कॉंग्रेस के सीता रमैया के साथ में था। जिसके पीछे महात्मा गांधी का सपोर्ट था इसका प्रचार-प्रसार खुद महात्मा गांधी जी ने किया था और कहा था अगर सीता रमैया जीता तो समझो की मैं जीता। लेकिन यहां जीत सुभाष चंद्र बोस की हुई, सीता रमैया को 1375 वोट मिले जबकि 1580 वोट सुभाष चंद्र बोस को मिले। महात्मा गाँधी जी सुभाष चंद्र बोस को पसंद नहीं करते थे सीता रमैया का हार मतलब कि गाँधी जी का हार है।

तो यहां यहां सुभाष चंद्र बोस को महात्मा गांधी ने कहा कि तुम इस्तीफा दे दो चूंकि सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानते थे और सुभाष चंद्र बोस भी गाँधी जी की बात मान जाते हैं और इस्तीफा देने के लिए राजी हो जाते हैं। 

भारत देश का बंटवारा कैसे हुआ? partition of India

भारत के विभाजन के समय अली जिन्नाआगे आ गए, अली जिन्ना ने कहा कि मुझे अलग पाकिस्तान चाहिए तो चाहिए। इसको लेकर महात्मा गांधी जी ने विरोध भी किया अली जिन्ना को बहुत समझाया भी लेकिन नहीं माने तो उसके बाद वायसराय लार्ड माउंटबेटन के पास गए और कहा तुम सिर्फ आजादी दे दो बंटवारे का हमलोग आपस में समझ लेंगे। लेकिन यहां माउंटबेटन ने कहा नहीं, साथ में ही बंटवारा करना पड़ेगा। उसके बाद जिन्ना को समझाया की पहले आजादी ले लेते हैं फिर उसके बाद तुमको अलग पाकिस्तान दे देंगे ठीक हैं लेकिन यहां फिर भी जिन्ना नहीं माने।

जिन्ना पहले ही कोलकाता में दंगा करवा चुके थे 5000 के करीब लोग मारे जा चुके थे, बहुत-से लोग तो बेघर हो चुके थे। जिन्ना जान रहे थे कि जब तक अंग्रेज है पाकिस्तान मिल जाएगा अगर मैंने महात्मा गांधी की बात सुनी और उसके बाद अंगेज चले जायेगे तो क्या पता मुझे पाकिस्तान मिले या ना मिले। मेरी फिर कौन सुनेगा इसके बाद जिन्ना माउंटबेटन के पास जाकर उसके पैर पकड़ लिए और कहने लगा कि देख भाई मुझे तो अलग पाकिस्तान चाहिए तो चाहिए। जिन्ना महात्मा गांधी जी की कोई बात सुने ही ना बस पाकिस्तान का रट लगाया था।

उसके बाद पटेल और नेहरू को कहा चलो इसको पाकिस्तान दे देते हैं और देश को अलग नहीं करो पूरा भारत देश इसी को ही दे देते हैं और इसी को प्रधानमंत्री भी बना देते हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरु गुस्सा हो गए और कहा ऐसा थोड़े ही ना होता है नेहरू और पटेल भी महात्मा गांधी के उसके प्रधानमंत्री बनने के पक्ष मे नही थे। बोले जिन्ना को बनने दे प्रधानमंत्री कम से कम देश तो अलग नहीं होगा। नेहरू ने कहा कि देश में करीब 500 से ऊपर अलग अलग रियासते है वो बुरा मान जाएंगे, गड़बड़ हो जाएगी।

नेहरू को सत्ता मिले इसके लिए आखिर महात्मा गांधी को अलग पाकिस्तान बनाना ही पड़ा और एक अलग पाकिस्तान बनने दिया इसके लिए महात्मा गांधी ने ज़्यादा किसी को जोर नहीं दिया सिर्फ नेहरू की सता के लिए महात्मा गाँधी ने एक अलग मुल्क बनने दे दिया।

महात्मा गाँधी जी जिनको अल्बर्ट Einstein अपना गुरु मानते थे और 20 century के महान इंसान मानते थे, टैगोर ने उन्हें महात्मा की उपाधि दी थी, सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें father of nation कहा था। Martin Luther King उन्हें अपना गुरु मानते थे इसके सम्मान में सरदार पटेल ने अपना पद त्याग दिया 150 से अधिक देशों में 800 से ज्यादा डाक की postal टिकेट जारी की गई। और करीब 70 देशों में इनकी मूर्ति बनी हुई है, 90000 के आसपास किताबे लिखी जा चुकी है 45 से ज्यादा फ़िल्में बन चुकी है और भी बहुत सी चीजे हैं।

महात्मा गांधी के बारे में कुछ रोचक तथ्य

  • महात्मा गांधी को भारत का राष्ट्रपिता भी कहा जाता है, सुभाष चन्द्र बोस ने साल 1944 में रंगून के रेडियो स्टेशन के एक प्रसारण के दौरान महात्मा गांधी जी को ‘राष्ट्रपिता’ कहकर सम्बोधित किया था।

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