गुरु तेग बहादुर का जीवनी : Guru Teg Bahadur biography in hindi, Guru Teg Bahadur jayanti

गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय : Guru Teg Bahadur Biography in Hindi

एक ऐसा इंसान जिसने अपने धर्म के लिए किसी का भी जान ले ले लेता था, और दूसरों के धर्म के लिए अपनी जान निछावर करने के लिए तैयार रहते थे, ऐसे इंसान थे गुरु तेग बहादुर जी। गुरु तेग बहादुर जी (Guru Teg Bahadur) का समग्र जीवन धर्म रक्षा मे गुजरा है। मुगल शासन के दरमियान जब हिंदू कमजोर पर रहा था तो उस समय गुरु तेग बहादुर जी ही थे। जिन्होंने अपने कौम में साहस भरने के लिए अपनी जान की परवाह न करते हुए शहीद हो गए। गुरु तेग बहादुर जी शहादत देने वाले सिख धर्म के 9वें सिख गुरु थे।

सिखईस्म धर्म में कुल 10 सिख धर्मगुरु हुए हैं सबसे पहले गुरु नानक देव का नाम आता है।

गुरु नानक देव (1469-1539)
गुरु अंगद (1504-1552)
गुरु अमर दास (1479-1574)
गुरु रामदास (1534-1581)
गुरु अर्जुन देव (1563-1606)
गुरु हरगोविंद (1595-1644)
गुरु हर राय जी (1630-1661)
गुरु हरकृष्णन जी (1656-1664)
गुरु तेग बहादुर (1621-1675)
गुरु गोविंद सिंह (1666-1706)

गुरु नानक जी को सभी धर्मों के लोग मानते थे उन्होंने कभी नहीं ऐसा कहा कि यह एक अलग नए धर्म की स्थापना करने जा रहे हैं। गुरु नानक जी ने कभी भी किसी को ऐसा नहीं कहा कि आप मेरे शरण में आ जाए। गुरु नानक देव जी ने हमेशा से कहा है कि आप अपने अपने धर्म में रहे उनको आप माने कोई जोर जबरदस्ती नहीं है कि आप किसी अन्य धर्म में शामिल हो।

तेग बहादुर जी (Guru Teg Bahadur) हिंद की चादर बनकर अतुलनीय धैर्य से क्रूर मुगल शासन का अहंकार चूर चूर कर दिया। जिसने दूसरों का धर्म को अपना समझ कर अपना सर कलम करवा दिया। गुरु तेग बहादुर साहिब जी को हिन्द-दी-चादर” के नाम से भी जानते हैं। धर्म और मानवता सिद्धांतों के लिए शहीद होने वाले गुरु तेग बहादुर जी का स्थान सिख धर्म में बहुत विशेष महत्व रखता है।

गुरु तेग बहादुर का जन्म व परिवार (Guru Teg Bahadur birth & Family)

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Guru Teg Bahadur photo

गुरु तेग बहादुर साहिब जी का जन्म 1 अप्रैल सन् 1621 ईस्वी में आज के अमृतसर (पंजाब) में हुआ था। बचपन में इनका नाम त्यागमल रखा गया था, सिख धर्म के छठवें गुरु गुरु हरगोविंद साहिब जी के 5वें पुत्र थे। गुरु तेग बहादुर साहिब जी की माता जी का नाम नानकी था। गुरु तेग बहादुर जी अपने पिता के सबसे छोटे बेटे थे। गुरु तेग बहादुर साहिब जी का मृत्यु 11 नवम्बर सन् 1675 में हुई थी। लेकिन मात्र 14 साल की उम्र में मुगलों के साथ हुई लड़ाई में पुत्र त्यागमल की पराक्रम को देखकर गुरु हरगोविंदजी साहिब में उनका नामकरण तेग बहादुर कर दिया।

गुरु तेग बहादुर साहिब का जीवनी

गुरु हर किशन साहिब के निधन होने से पहले उन्होंने अगले गुरु की पहचान बताई थी कि वह बाबा बाकल होंगे और गुरु तेग बहादुर (Guru Teg Bahadur) बाकल में ही रहते थे। तेग बहादुर साहिब जी ने कई गीत भी लिखे थे। गुरु नानक देव की तरह ही उन्होंने भी कई जगहों का भ्रमण किया, उनके जीवन का अंत सिख प्रतिबद्धता की धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के लिए एक जबरदस्त सीख बनकर उभरा था।

मुगल शासन काल के दरमियान औरंगज़ेब द्वारा हिन्दू पंडितों को ज़बरदस्ती मुस्लिम धर्म में परिवर्तित किया जा रहा था। तब गुरु तेग बहादुर साहिब (Guru Teg Bahadur) ने हिन्दू धर्म के लिए लड़ाई लड़ी। उन्होंने मुगल शासक के सामने एक शर्त रखी कि यदि वह उनका धर्म परिवर्तन करा पाया तो सभी हिन्दू अपना धर्म परिवर्तन करवा लेंगे। इसके बाद औरंगज़ेब ने उन्हें कई प्रकार से प्रताड़नाएं देनी शुरु की, लेकिन वह उन्हें हरा नहीं पाया और अंत में उसने गुरु तेग बहादुर साहिब जी के सिर को कलम करवा दिया। कहा जाता है कि जेल जानें से पहले गुरु जी ने औरंगज़ेब को एक चिट्ठी लिखी थी

जो उन्होंने केवल अपने शहीद होने के बाद ही औरंगज़ेब तक पहुंचाने को कहा था। यह भी कहा जाता है कि जब वह जेल में थे उन्होंने मुगल साम्राज्य के पतन और पश्चिमी ताकतों के आने की भी भविष्यवाणी की थी।

संत स्वरूप गुरु तेग बहादुर (Guru Teg Bahadur) को बचपन से ही गुरुबाणी, वेद शास्त्र एवं उपनिषदों से बहुत लगाव था। अध्यात्म के साथ-साथ के साथ-साथ विभिन्न शास्त्र विद्याओं में पारंगत थे, सन 1604 के मार्च महीने में सिख के आठवें सिख गुरु गुरु हरिकृष्ण जी साहिब की अकाल मृत्यु के पश्चात तेग बहादुर जी को सिखों के 9वें गुरु के रूप में गुरु गद्दी सौंप दी गई। गुरु तेग बहादुर साहिब गुरु नानक द्वारा बताए मार्ग पर चलते हुए भारत की विभिन्न स्थलों की यात्रा कर गरीब दुखियारो के कष्ट दूर करने लगे। इस कारण धीरे-धीरे हजारों लोग जुड़ने लगे सिख धर्म की दीक्षा लेने लगे।

इस प्रकार समूचे उत्तर भारत में गुरु तेग बहादुर जी साहिब और सिख धर्म का प्रभाव पड़ने लगा। इसी दौरान दिल्ली की मुगल सत्ता शाहजहां के हाथों से निकलकर क्रूर और निर्दयी औरंगज़ेब के हाथ में जा चुकी थी। अपने 3 भाई और दो भतीजों की हत्या कर और बड़ी निर्दयता से सबको अपने कब्जे में कर लिया था। खुद को अब्दुल मुजफ्फर मोइनुद्दीन मोहम्मद औरंगजेब समझकर वह गैर मुस्लिमों को काफिर मानने लगा था, हिंदू तीर्थ यात्राओं पर उसने हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था। मुस्लिम धर्म से ऊपर कोई धर्म हो ही नहीं सकता, यह मानकर उसने काफिरों को जिंदा रहने का कोई अधिकार नहीं है।

अगर जिंदा रहना ही है तो हमारी हर चीज कुबूल करना ही होगा ये फरमान जारी कर दिया था, उस समय कश्मीर हिंदुओं के विद्वान पंडितों का गढ़ हुआ करता था, औरंगजेब ने कश्मीर पर शेर अफगान खान को नियुक्त कर हुकुम की तामिल करने का आदेश दे दिया।शेर अफगान खान बड़ी निर्दयता से हिंदुओं पर जुल्म ढाने लगे माताओं बहनों पर अत्याचार होने लगे हिंदू पंडित बड़ी दुविधा में फंस गए।

ऐसे हालातों में समूचे उत्तर भारत में हिंदू पंडितों का कोई सहारा नहीं था शिवाय गुरु तेग बहादुर साहिब जी (Guru Teg Bahadur) के 25 मई (मार्च) सन 1675 को पंडित कृपा राम के अगुवाई में कश्मीरी पंडितों का एक समूह था अनंतपुर साहिब में गुरु तेग बहादुर जी के सामने प्रस्तुत हुआ।

हिंदुओं की हो रही धार्मिक प्रताड़ना को सुनकर गुरु तेग बहादुर जी (Guru Teg Bahadur) परेशान हो उठे रोते बिलखते पंडित गुरु तेग बहादुर जी के सामने मदद की गुहार लगाने लगे। सभी पंडितों की आवाज सुनकर तेग बहादुर जी के 8 साल के पुत्र गोविंद सिंह वहां आ गए और उन्होंने अपने पिता से इस समस्या का समाधान पूछा गुरु बोले कमजोर और मुर्दा बन चुकी इस कौम में नई जान फूंकने के लिए किसी ना किसी महापुरुष को तो कुर्बानी देनी ही होगी पुत्र गोविंद तुरंत बोले तो आप से बढ़कर महापुरुष इस दुनिया में कौन है भला अपने 8 साल के पुत्र के इन तेजस्वी शब्दों को सुनकर गुरु तेग बहादुर जी गदगद हो गए।

उन्होंने पंडितों से कहा कि जाओ कह दो उस बादशाह से बात से पहले गुरु तेग बहादुर (Guru Teg Bahadur) का धर्म परिवर्तन करके दिखाओ और फिर हम सब खुशी से हमारा धर्म परिवर्तन करने को राजी हो जाएंगे। बादशाह औरंगजेब ने यह बात सुनते ही तुरंत तेग बहादुर जी को दिल्ली दरबार मे पहुंचने को कहा।

गुरु तेग बहादुर जी के एक एक करके सभी भाइयो की मौत सजा

समय की नजाकत को समझते हुए गुरु तेग बहादुर जी (Guru Teg Bahadur) अपने पुत्र गोविंद सिंह को गुरु की गद्दी सौंप कर दिल्ली के लिए रवाना हो गए। उनके साथ बड़ी निर्दयता से भाई मती दास भाई दयाला भाई सती दास और भाई जैता भी शहादत का चोला ओढ़कर आनंदपुर साहिब से निकल पड़े रास्ते में दिन दुखियारो की मदद करते गए। गुरु तेग बहादुर इतना निडर से अपनी तरफ आता देख और आम लोगों का प्यार पाता देख औरंगजेब बौखला गए।

उसने तुरंत गुरु तेग बहादुर जी (Guru Teg Bahadur) को और उसके साथियों के साथ बंदी बना कर लाने का आदेश दे दिया। मुगल सेना ने तेग बहादुर जी को आगरा से बंदी बनवा कर दिल्ली लाया गया। दिल्ली पहुंचते ही औरंगजेब अपना एक नवाब गुरुजी के पास भेजा नवाब ने गुरु जी को चेतावनी देते हुए कहा अगर उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया तो उनको उनके साथियों के साथ मृत्यु स्वीकार करना होगा।

लेकिन गुरु जी की निर्भय चेहरे पर डर की कोई शिकंज नहीं थी, ऐसे में औरंगजेब की बौखलाहट और बढ़ गई। और जी और गुरु तेग बहादुर जी (Guru Teg Bahadur) के साथियों की एक एक करके मौत देना शुरू किया। गुरू तेग बहादुर जी को डराकर धर्म परिवर्तन को राजी करने का भाई मती दास को गुरु तेग बहादुर जी की आंखों के सामने आरी से काट कर मार दिया गया। भाई मती दास ने मरते दम तक आरी से बदन को कटने दिया लेकिन अपने धर्म को नहीं छोड़ा, उसके बाद भाई दयाला को भी दर्दनाक मौत दी उसे उबलते पानी में डाला गया भाई दयाला भी अपने धर्म पर अडिग रहें और हंसते-हंसते शहीद हो गए।

Guru Teg Bahadur photo

और फिर फिर भाई सती दास को रुई में लपेटकर गुरू तेग बहादुर जी के सामने जला दिया गया। भाई सती दास ने मुस्कुराते हुए मौत को गले लगा लिया, और बोले जींद जाए तो जाए मेरा सिख धर्म कभी न जाए। क्रूर औरंगजेब के क्रूरता का अंत होना अभी बाकी था, उसने काजीभौरा को गुरु तेग बहादुर जी (Guru Teg Bahadur) के पास भेजकर कलमा पढ़वाने को कहा गुरु जी ने बड़े ही विनम्र भाव से काजी से कहा धर्म त्याग करने से बेहतर मुझे भी मृत्यु आ जाए। गुरु तेग बहादुर जी का अटल और निच्छल जवाब सुनकर औरंगजेब ने उनका सिर कलम करने का आदेश (फरमान) जारी कर दिया।

Guru Teg Bahadur photo

11 नवंबर सन 1675 गुरुवार के दिन दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी (Guru Teg Bahadur) सिर कलम कर दिया गया। सिखों के 9वें धर्म गुरू हिंदूओ के धर्म रक्षा के लिए मौत को हंसते हंसते गले लगा लिया। चांदनी चौक में पड़े गुरू तेग बहादुर जी के शीश को भाई जैता बड़ी हिम्मत से एक कपड़े में लपेटकर आनंदपुर साहिब लेकर आए और दिल्ली के एक व्यापारी लकी बंजारा जो गुरुजी भक्त थे उन्होंने गुरू जी के शीश को अपने गांव रकाबगंज ले गए और अपने घर में घुसी के धड़कन रखकर पूरे घर को आग लगा दी और इस तरह गुरु तेग बहादुर जी साहिब का अंतिम संस्कार किया गया।

गुरु तेग बहादुर साहिब जी (Guru Teg Bahadur) के बलिदान ने शहंशाहे हिंद के गुरुर को नेस्तनाबूद कर दिया था सिक्ख धर्म के गुरु ने हिंद की चादर बनकर एक अधर्मी शासक को अपनी औकात से रूबरू करवाया था। उसे धर्म का पाठ पढ़ावाया था गुरु तेग बहादुर साहिब जी (Guru Teg Bahadur) के इस अमर बलिदान को पूरा हिंदुस्तान कभी भूल नहीं पाएगा।

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