प्राचीन काल में झारखंड का इतिहास | झारखंड का प्राचीन इतिहास क्या है?

झारखंड में मौर्य और गुप्त काल का इतिहास | झारखंड का पहला राजा कौन था?

प्राचीन काल को चार भागों में बांटा गया है –

  1. मौर्य काल
  2. मौर्योत्तर काल
  3. गुप्त काल
  4. गुप्तोत्तर काल

झारखंड में मौर्य काल

झारखंड में मौर्य काल

मौर्य काल (321 ईसा पूर्व – 185 ईसा पूर्व) भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण युग था, जिसने झारखंड सहित पूरे उपमहाद्वीप को सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभावित किया। झारखंड का क्षेत्र उस समय मगध साम्राज्य के अधीन था, जो मौर्य साम्राज्य का केंद्र था। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में कई स्वतंत्र और अर्ध-स्वतंत्र राज्यों का उदय हुआ। इस काल में शुंग, सातवाहन, कुषाण और गुप्त वंश जैसे शक्तिशाली राजवंशों का प्रभाव प्रमुख रहा।

मौर्य साम्राज्य और झारखंड क्षेत्र का संबंध

  1. चंद्रगुप्त मौर्य का शासन: – चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने शासनकाल में मगध (आधुनिक बिहार) के साथ-साथ झारखंड क्षेत्र को भी अपने साम्राज्य में शामिल किया। झारखंड का क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और खनिज संपदा के लिए प्रसिद्ध था, जो मौर्य साम्राज्य के आर्थिक समृद्धि का एक प्रमुख स्रोत बना।
  2. अशोक का प्रभाव: – सम्राट अशोक के शासनकाल में झारखंड क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। अशोक ने अपने धम्म प्रचार के तहत यहां कई स्तूपों और शिलालेखों की स्थापना करवाई। हालाँकि झारखंड में मौर्यकालीन संरचनाओं के सीमित प्रमाण मिले हैं, फिर भी ऐतिहासिक स्रोतों से संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र मौर्य प्रशासन के अधीन था।
  3. आर्थिक महत्व: – झारखंड की खदानों से प्राप्त लोहा, तांबा और अन्य खनिज पदार्थ मौर्य साम्राज्य के हथियार निर्माण और निर्माण कार्यों के लिए अत्यंत उपयोगी थे। यह क्षेत्र व्यापार मार्गों से भी जुड़ा था, जो मगध को दक्षिण भारत और बंगाल क्षेत्र से जोड़ता था।
  4. सांस्कृतिक प्रभाव: – मौर्य शासन के दौरान झारखंड के जनजातीय समाज पर बौद्ध धर्म और मौर्य संस्कृति का प्रभाव पड़ा। कुछ क्षेत्रों में आज भी मौर्यकालीन कला और स्थापत्य के अवशेष देखे जा सकते हैं।

महत्वपूर्ण स्थल

झारखंड के कुछ पुरातात्विक स्थलों पर मौर्यकालीन सभ्यता के प्रमाण मिलते हैं, जैसे कि

  • चाइबासा
  • हजारीबाग
  • साहिबगंज

निष्कर्ष

मौर्य काल में झारखंड क्षेत्र आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण था और यहाँ का समाज धीरे-धीरे बौद्ध धर्म के प्रभाव में आया। प्राकृतिक संपदा के कारण यह क्षेत्र मौर्य शासन का एक अभिन्न हिस्सा बना। मगध से दक्षिण भारत की ओर जाने वाला व्यापारिक मार्ग झारखंड से होकर जाता था। अतः मौर्यकालीन झारखंड का अपना राजनीतिक आर्थिक एवं सामाजिक महत्व था।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र क्या बोलते हैं?

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस क्षेत्र को कुकुट/कुकुटदेश नाम से चिन्हित किया गया है। कौटिल्य के अनुसार कुकुटदेश में गणतंत्रतात्म शासन प्रणाली स्थापित थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य ने आटविक नाम का एक पदाधिकारी की नियुक्त किया था। जिसका उद्देश्य जनजातियों को नियंत्रण करना, मगध साम्राज्य के लिए इनका प्रयोग तथा शत्रुओंसे इनके गठबंधन को रोकना था। इंद्रनावक नदियों की चर्चा करते हुए कौटिल्य ने लिखा कि इंद्रनावक की नदियों से हीरे प्राप्त किए जाते थे। इंद्रनावक संभवत: ईब और शंख नदियों का इलाका था। चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल के दौरान सेना के प्रयोग के लिए झारखंड से हाथी मंगवाया जाता था।

अशोक

अशोक के 13वें शिलालेख में समीपवर्ती राज्यों की सूची मिलती है। जिसमें से की एक आटवीक/आटाव/आटवी प्रदेश (बघेलखंड से उड़ीसा के समुंद्र तट तक विस्तृत) भी थी। और झारखंड क्षेत्र में इस प्रदेश में शामिल था। अशोक झारखंड की जनजातियों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण था। अशोक के पृथक कलिंग शीलालेख – II में वर्णित हैं कि – इस क्षेत्र की अविजित जनजातियों को मेरे धम्म (यह बौद्ध धर्म का एक अहम सिद्धांत है) का आचरण करना चाहिए, ताकि वे लोक और परलोक की प्राप्ति हो। अशोक ने झारखंड में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए रक्षित नमक अधिकारी को भेजा था।

मौर्योत्तर काल

मौर्योत्तर काल में विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में अपने अपने राज्य स्थापित किए इसके अलावा भारत का विदेशों से व्यापारिक संबंध स्थापित हुआ जिसके प्रभाव झारखंड में भी दिखाई देते हैं।

झारखंड में मौर्योत्तर काल (185 ईसा पूर्व के बाद)

मौर्य साम्राज्य के पतन (185 ईसा पूर्व) के बाद झारखंड क्षेत्र में विभिन्न राजवंशों राजपूतों, पाल वंश और अन्य शक्तियों का प्रभाव बढ़ा। इस काल में झारखंड का सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य बदलने लगा। मौर्योत्तर काल में यहाँ शुंग, कण्व, सातवाहन, गुप्त, और अन्य स्थानीय जनजातीय शासकों का शासन रहा।

1. शुंग वंश (185 ईसा पूर्व – 73 ईसा पूर्व)

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद पुष्यमित्र शुंग ने मगध में शुंग वंश की स्थापना की। झारखंड क्षेत्र शुंगों के अधीन था, लेकिन इस दौरान बौद्ध धर्म का प्रभाव कम हुआ और वैदिक धर्म को फिर से बढ़ावा मिला। इस काल में झारखंड में ब्राह्मणवादी संस्कृति के कुछ प्रमाण मिलते हैं।

2. कण्व वंश (73 ईसा पूर्व – 30 ईसा पूर्व)

कण्व वंश का प्रभाव झारखंड में कम था, लेकिन यह क्षेत्र फिर भी मगध साम्राज्य से जुड़ा रहा। व्यापारिक दृष्टि से झारखंड महत्वपूर्ण बना रहा, खासकर खनिज और वन संपदा के कारण।

3. सातवाहन वंश (लगभग 1 ईसा पूर्व – 3री सदी ईस्वी)

सातवाहनों का प्रभाव झारखंड के दक्षिणी क्षेत्रों (खासकर संथाल परगना और सिंहभूम) में देखा गया। इस काल में झारखंड में व्यापार मार्ग विकसित हुए, जो दक्कन और बंगाल को जोड़ते थे। सातवाहनों ने लोहे और धातु खनन को बढ़ावा दिया, जिससे झारखंड के आदिवासी समुदायों की आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ीं।

4. गुप्त वंश (लगभग 4थी – 6ठी सदी ईस्वी)

चंद्रगुप्त प्रथम और समुद्रगुप्त के समय झारखंड गुप्त साम्राज्य का हिस्सा बन गया। गुप्तों के शासन में झारखंड क्षेत्र में हिंदू धर्म और ब्राह्मणवादी संस्कृति का विस्तार हुआ। हजारीबाग और पलामू के कुछ स्थलों से गुप्तकालीन अवशेष मिले हैं। इस काल में शिक्षा और कला का भी विकास हुआ, जिससे झारखंड की सामाजिक संरचना प्रभावित हुई।

5. स्थानीय जनजातीय शासकों का उदय (गुप्तोत्तर काल – 6ठी सदी के बाद)

गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद झारखंड में स्थानीय जनजातीय शासकों का प्रभाव बढ़ा। मुंडा, संथाल, उरांव और अन्य जनजातियों ने अपने क्षेत्र में स्वतंत्र शासन स्थापित किया। यह काल झारखंड में एक विशिष्ट आदिवासी संस्कृति के विकास का था, जहाँ बाहरी शासकों का प्रभाव सीमित रहा।

निष्कर्ष

मौर्योत्तर काल में झारखंड विभिन्न राजवंशों के अधीन रहा, लेकिन धीरे-धीरे स्थानीय जनजातीय शक्तियाँ उभरने लगीं। इस काल में व्यापार, खनन और सांस्कृतिक बदलाव महत्वपूर्ण थे। गुप्त काल में झारखंड हिंदू धर्म और ब्राह्मणवादी परंपराओं से प्रभावित हुआ, जबकि शुंग और सातवाहन काल में बौद्ध और जैन प्रभाव भी देखा गया।

मौर्योत्तर काल में सिंहभूम पर क्या प्रभाव पड़ा? सिंहभूम में मौर्योत्तर काल (185 ईसा पूर्व के बाद )

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद, झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र में राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव देखने को मिले। मौर्योत्तर काल में यह क्षेत्र बाहरी शासकों के नियंत्रण में तो रहा, लेकिन धीरे-धीरे स्थानीय जनजातीय राजाओं और शक्तियों का उदय हुआ। इस दौरान शुंग, सातवाहन, गुप्त, और स्थानीय आदिवासी शासकों का प्रभाव देखा गया।

1. शुंग वंश (185 ईसा पूर्व – 73 ईसा पूर्व) का प्रभाव

  • पुष्यमित्र शुंग ने मौर्यों को हराकर शुंग वंश की स्थापना की।
  • सिंहभूम क्षेत्र पर शुंगों का सीधा प्रभाव कम था, लेकिन उनके शासनकाल में ब्राह्मणवादी परंपराएँ मजबूत हुईं।
  • इस काल में बौद्ध धर्म का प्रभाव कमजोर हुआ और वैदिक परंपराओं का पुनर्जागरण हुआ।
  • सिंहभूम में इस काल के बहुत कम पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह क्षेत्र शुंगों की मुख्य प्रशासनिक गतिविधियों से दूर था।

2. सातवाहन वंश (लगभग 1 ईसा पूर्व – 3री सदी ईस्वी)

  • सातवाहन वंश ने दक्षिण भारत और दक्कन क्षेत्र में शासन किया, लेकिन झारखंड के कुछ भाग उनके व्यापार मार्गों का हिस्सा थे।
  • सिंहभूम की खदानें, विशेष रूप से लौह अयस्क और तांबे की खदानें, इस काल में महत्वपूर्ण व्यापारिक स्रोत बनीं।
  • इस काल में जनजातीय समूहों के साथ व्यापारिक संबंध विकसित हुए, और सिंहभूम क्षेत्र खनिज संपदा के कारण आर्थिक रूप से उभरने लगा।

3. गुप्त वंश (लगभग 4थी – 6ठी सदी ईस्वी)

  • गुप्त शासकों, विशेष रूप से समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय, ने झारखंड के क्षेत्रों पर शासन किया।
  • सिंहभूम गुप्त साम्राज्य के अधीन तो था, लेकिन यह उनकी मुख्य प्रशासनिक गतिविधियों से दूर स्थित था।
  • इस काल में हिंदू धर्म और ब्राह्मणवादी संस्कृति का प्रभाव बढ़ा।
  • सिंहभूम में गुप्तकालीन मंदिरों या मूर्तियों के प्रमाण कम हैं, लेकिन यह संभव है कि इस क्षेत्र में जनजातीय और आर्य संस्कृति का मिश्रण हुआ हो।

4. स्थानीय जनजातीय राजाओं का उदय (गुप्तोत्तर काल – 6ठी सदी के बाद)

  • गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद, सिंहभूम में स्थानीय जनजातीय राजाओं का प्रभाव बढ़ने लगा।
  • हो, मुंडा, उरांव और अन्य जनजातियों ने स्वतंत्र शासन स्थापित किया।
  • यह क्षेत्र बाहरी आक्रमणकारियों से अपेक्षाकृत स्वतंत्र रहा और यहाँ एक विशिष्ट आदिवासी शासन प्रणाली विकसित हुई।
  • सिंहभूम की स्थानीय परंपराएँ और सामाजिक संरचना मौर्योत्तर काल से ही मजबूत होती गईं।
  • सिंहभूम से रोमन साम्राज्य के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिसमें झारखंड के वैदेशिक संबंधों की पुष्टि होती है।

निष्कर्ष

मौर्योत्तर काल में सिंहभूम धीरे-धीरे बाहरी प्रभाव से अलग होकर एक स्वतंत्र जनजातीय क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ। शुंग, सातवाहन और गुप्त काल के दौरान यह क्षेत्र आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण बना रहा, लेकिन राजनीतिक रूप से यह मुख्य साम्राज्यों की परिधि पर था। गुप्तों के पतन के बाद स्थानीय जनजातीय शासकों का प्रभुत्व बढ़ा और सिंहभूम में एक अलग सांस्कृतिक पहचान बनी।

चाईबासा पर मौर्योत्तर काल का प्रभाव

मौर्योत्तर काल (मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद का काल) भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण चरण था, जिसका प्रभाव चाईबासा और उसके आसपास के क्षेत्रों पर भी पड़ा। चाईबासा वर्तमान झारखंड राज्य में स्थित है और ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र जनजातीय संस्कृति, व्यापारिक मार्गों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र रहा है।

मौर्योत्तर काल का प्रभाव

मौर्य साम्राज्य के पतन (ईसा पूर्व 185) के बाद भारत में राजनीतिक अस्थिरता का दौर आया। इस समय क्षेत्रीय शक्तियों का उदय हुआ, जिसका प्रभाव चाईबासा क्षेत्र पर इस प्रकार पड़ा:

  1. राजनीतिक प्रभाव:
    • मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद स्थानीय जनजातीय शासकों और छोटे-छोटे राजवंशों का उदय हुआ। चाईबासा क्षेत्र में भी विभिन्न जनजातीय समूहों ने अपनी सत्ता स्थापित की।
    • शुंग, सातवाहन और कुषाण जैसे राजवंशों का प्रभाव इस क्षेत्र में देखा गया।
  2. सांस्कृतिक प्रभाव:
    • मौर्योत्तर काल में बौद्ध धर्म के प्रसार में कमी आई, जबकि हिंदू धर्म के विभिन्न संप्रदायों का प्रभाव बढ़ा। इस काल में वैदिक और लोक परंपराओं का समावेश हुआ।
    • चाईबासा क्षेत्र में अनेक जनजातीय परंपराओं के साथ-साथ मुख्यधारा की धार्मिक प्रथाओं का समन्वय देखने को मिला।
  3. आर्थिक प्रभाव:
    • मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद व्यापार मार्गों में बदलाव हुआ, जिससे चाईबासा क्षेत्र के स्थानीय व्यापारियों को नए अवसर मिले।
    • लौह अयस्क, वन उत्पाद और हस्तशिल्प के व्यापार ने इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया।
  4. सामाजिक प्रभाव:
    • इस काल में स्थानीय जनजातीय समाज में परिवर्तन देखने को मिला। सामाजिक संरचनाओं में नए प्रभाव आए और जाति व्यवस्था का प्रभाव बढ़ने लगा।
  5. कला और स्थापत्य:
    • मौर्योत्तर काल में गुप्तकालीन स्थापत्य कला का प्रभाव इस क्षेत्र में स्पष्ट रूप से देखा गया। मंदिर निर्माण, मूर्तिकला और चित्रकला की शुरुआत ने इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध किया।

निष्कर्ष

चाईबासा पर मौर्योत्तर काल का प्रभाव राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर गहराई से महसूस किया गया। इस काल में जनजातीय संस्कृति के साथ-साथ मुख्यधारा के धार्मिक और सामाजिक तत्वों का समावेश हुआ, जिससे क्षेत्र का समग्र विकास हुआ।

चाईबासा से खण्डों – सिथियन सिक्के प्राप्त हुए।

रांची पर मौर्योत्तर काल का प्रभाव

मौर्योत्तर काल (Post-Mauryan Period) भारतीय इतिहास का वह दौर था जो मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद शुरू हुआ, अर्थात लगभग 185 ईसा पूर्व के बाद का समय। इस काल में रांची क्षेत्र (जो वर्तमान झारखंड का हिस्सा है) पर भी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ा।

रांची क्षेत्र पर प्रभाव

मौर्योत्तर काल में रांची क्षेत्र मुख्यतः जनजातीय बाहुल्य क्षेत्र था, जिसमें मुण्डा, उरांव, खड़िया और अन्य स्थानीय जनजातियों का निवास था। इस क्षेत्र पर निम्नलिखित प्रभाव दिखाई दिए:

1. राजनीतिक प्रभाव

  • मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद रांची क्षेत्र में कोई बड़ा राजनीतिक केंद्र नहीं उभरा, लेकिन स्थानीय जनजातीय प्रमुखों ने अपनी सत्ता स्थापित की।
  • इस दौरान शुंग और कुषाण साम्राज्य के प्रभाव के प्रमाण प्राप्त होते हैं, विशेष रूप से व्यापार मार्गों के माध्यम से इनका संपर्क बना रहा।

2. आर्थिक प्रभाव

  • मौर्य काल में स्थापित व्यापार मार्ग मौर्योत्तर काल में भी जारी रहे। रांची क्षेत्र लौह अयस्क (Iron Ore) जैसे खनिज संसाधनों के लिए प्रसिद्ध था, जिससे इस क्षेत्र का आर्थिक महत्व बना रहा।
  • स्थानीय जनजातियों के हस्तशिल्प, धातु निर्माण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला।

3. सामाजिक प्रभाव

  • मौर्योत्तर काल में बौद्ध धर्म और जैन धर्म का प्रभाव भी इस क्षेत्र में देखा गया। बौद्ध भिक्षुओं के आगमन से क्षेत्र में सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ा।
  • रांची क्षेत्र में निवास करने वाली जनजातियों ने अपनी परंपरागत सामाजिक संरचना को बनाए रखा, हालांकि कुछ बाहरी प्रभाव भी देखे गए।

4. धार्मिक प्रभाव

  • मौर्योत्तर काल में हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के साथ शैव और वैष्णव परंपराओं का प्रभाव बढ़ा। रांची क्षेत्र में कुछ प्राचीन शिवलिंग और अन्य मूर्तियों के अवशेष इसी काल के माने जाते हैं।
  • बौद्ध धर्म और जैन धर्म के अनुयायियों ने भी इस क्षेत्र में अपने धर्म का प्रचार किया।

5. सांस्कृतिक प्रभाव

  • इस काल में मूर्तिकला, स्थापत्य कला और चित्रकला का विकास हुआ, जिसका प्रभाव जनजातीय कला शैलियों में भी देखा गया।
  • स्थानीय लोक नृत्य, गीत-संगीत और परंपराएं यथावत बनी रहीं, लेकिन समय के साथ इनमें बाहरी प्रभाव भी जुड़ते गए।

6. प्रशासनिक प्रभाव

  • मौर्य प्रशासन की तरह संगठित प्रशासनिक ढांचा इस क्षेत्र में विकसित नहीं हुआ, लेकिन स्थानीय मुखियाओं और सरदारों ने समाज को संगठित बनाए रखा।

निष्कर्ष

रांची क्षेत्र पर मौर्योत्तर काल का प्रभाव मुख्य रूप से व्यापारिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर देखा गया। हालांकि यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से किसी बड़े साम्राज्य का प्रमुख केंद्र नहीं बना, लेकिन इसकी जनजातीय संस्कृति, खनिज संपदा और स्थानीय परंपराओं ने मौर्योत्तर काल में भी अपनी महत्ता बनाए रखी।

रांची से कुषाण कालीन सिक्के प्राप्त हुए जिससे मालूम पड़ता है कि यह क्षेत्र कनिष्क के प्रभाव में था।

गुप्त काल

गुप्त काल में अभूतपूर्व सांस्कृतिक विकास हुआ, अतः इस काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है। हजारीबाग के मदुही पहाड़ से गुप्तकालीन पत्थरों को काटकर मंदिर निर्माण हुआ। झारखंड में मुंडा पाहन महतो तथा भंडारी प्रथा गुप्त काल की देन माना जाता है।

समुद्रगुप्त

गुप्त वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक समुद्रगुप्त रहा है इसे भारत का नेपोलियन भी कहा जाता है। इनकी जीत का वर्णन प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद प्रशस्ति) में मिलता है। प्रयाग प्रशस्ति के लेखक हरिसेन है, इन विजयों में से एक आटवीक विजय भी था। झारखंड प्रदेश इसी आटवीक प्रदेश का हिस्सा था, इससे स्पष्ट होता है कि समुद्रगुप्त के शासनकाल में झारखंड क्षेत्र के उसके अधीन था। समुद्रगुप्त के पुण्डवर्धन को अपने राज्य में मिला लिया था जिसमें झारखंड का पूरा क्षेत्र शामिल था। समुद्रगुप्त के शासनकाल में छोटानागपुर को मुरूण्ड देश कहा गया है। समुद्रगुप्त के प्रवेश के पश्चात हर क्षेत्र में बौद्ध धर्म का पतन प्रारंभ हुआ था।

चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य

  • चंद्रगुप्त द्वितीय का प्रभाव झारखंड प्रदेश में भी था।
  • इसके काल में चीनी यात्री फाह्यान 405 ईस्वी में भारत आया था जिसने झारखंड क्षेत्र को कुक्कुटलाड कहा है। ‌

गुप्तकालीन पुरातात्विक अवशेष

स्थानप्राप्त अवशेष
पिठोरिया (रांची)पहाड़ी पर स्थित कुआं
सतगांवां (कोडरमा)मंदिर के अवशेष (उत्तर गुप्त काल से संबंधित)
मदुही पहाड़ (हजारीबाग)पत्थरों को काटकर बनाए गए 4 मंदिर

गुप्तोत्तर काल

शशांक

शशांक ने अपने विस्तृत साम्राज्य को सूचारू रूप से चलाने के लिए दो राजधानियाँ स्थापित की।

  1. संथाल परगना का बड़ा बाजार और
  2. दुलमी

झारखण्ड में शशांक का शासन

शशांक भारत के प्राचीन इतिहास में एक प्रतापी शासक था, जो बंगाल क्षेत्र का शासक था। उसका शासनकाल मुख्यतः 7वीं शताब्दी के प्रारंभ में हुआ। शशांक का प्रभाव केवल बंगाल तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उसने अपने शासन का विस्तार झारखण्ड, उड़ीसा और आसपास के क्षेत्रों तक भी किया।

शशांक का परिचय

शशांक गौड़ शासक था, जो बंगाल क्षेत्र में स्थित था। उसे भारतीय इतिहास में विशेष रूप से प्रसिद्ध बौद्ध सम्राट हर्षवर्धन और कामरूप के भास्करवर्मन के समकालीन के रूप में जाना जाता है। शशांक ने स्वयं को बंगाल के “सम्राट” की उपाधि दी थी और उसका राजधानी करनसुवर्ण (वर्तमान पश्चिम बंगाल) में स्थित थी।

झारखण्ड पर शशांक का प्रभाव

शशांक का प्रभाव झारखण्ड क्षेत्र पर भी देखा गया। उस काल में झारखण्ड का अधिकांश क्षेत्र घने जंगलों और जनजातीय समुदायों से भरा था, लेकिन यह क्षेत्र व्यापार मार्गों का महत्वपूर्ण हिस्सा था। शशांक ने झारखण्ड के कुछ हिस्सों पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया था ताकि वह अपनी सामरिक और व्यापारिक स्थिति को मजबूत कर सके।

शशांक का धार्मिक दृष्टिकोण

शशांक को हिन्दू धर्म का कट्टर अनुयायी माना जाता है। उसने बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम करने के लिए कई कदम उठाए थे। कुछ ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, शशांक ने बोधगया में स्थित बोधि वृक्ष को काटने का आदेश दिया था, जिससे बौद्ध धर्म के अनुयायियों में असंतोष उत्पन्न हुआ।

झारखण्ड क्षेत्र में प्रशासन

झारखण्ड के क्षेत्र में शशांक का शासन मुख्यतः कर वसूली, व्यापारिक मार्गों के नियंत्रण और सीमावर्ती क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित करने तक सीमित था। जनजातीय क्षेत्रों में उसका नियंत्रण आंशिक था, क्योंकि यहाँ की भौगोलिक स्थिति के कारण केंद्रीय नियंत्रण को लागू करना चुनौतीपूर्ण था।

प्राचान काल के शासकों में यह प्रथम शासक था जिसकी राजधानी झारखण्ड क्षेत्र में थी। शशांक शैव धर्म का अनुयायी था तथा इसने झारखण्ड में अनेक शिव मंदिरों का निर्माण कराया। शशांक के काल के प्रसिद्ध मंदिर वेणुसागर है जो कि एक शिव मंदिर है। यह मंदिर सिंहभूम और मयूरभंज की सीमा क्षेत्र पर अवस्थित कोचांग में स्थित है। शशांक ने बौद्ध धर्म के प्रति असहिष्यणुता की नीति अपनायी, जिसका उल्लेख ह्नेनसांग ने किया है। शशांक ने झारखण्ड के सभी बौद्ध केन्द्रों को नष्ट कर दिया। इस तरह झारखण्ड में बौद्ध-जैन धर्म के स्थान पर हिन्दू धर्म की महत्ता स्थापित हो गयी।

शशांक का पतन

शशांक की मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया और हर्षवर्धन तथा अन्य स्थानीय शासकों ने उसके क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

निष्कर्ष

शशांक ने झारखण्ड क्षेत्र पर राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव डाला, लेकिन इस क्षेत्र में उसकी पकड़ सीमित रही। झारखण्ड के जनजातीय समाज और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण शशांक का शासन व्यापक रूप से स्थापित नहीं हो सका।

हर्षवर्धन का झारखण्ड पर प्रभाव

झारखण्ड क्षेत्र पर हर्षवर्धन के शासन का प्रभाव ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। वर्धन वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक हर्षवर्धन था। हर्षवर्धन (606-647 ईस्वी) एक शक्तिशाली सम्राट थे, जिन्होंने उत्तरी भारत के अधिकांश हिस्से पर शासन किया। इसके साम्राज्य में काजांगल (राजमहल) का कुछ भाग शामिल था। काजांगल (राजमहल) में ही हर्षवर्धन ह्नेनसांग से मिला। ह्नेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत में राजमहल की चर्चा की है। उनके शासनकाल में झारखण्ड क्षेत्र पर भी सांस्कृतिक, धार्मिक और प्रशासनिक प्रभाव पड़ा।

हर्षवर्धन का शासनकाल और झारखण्ड पर प्रभाव

  1. राजनीतिक प्रभाव:
    हर्षवर्धन ने अपने साम्राज्य का विस्तार बिहार, बंगाल और उड़ीसा तक किया, जिससे झारखण्ड का क्षेत्र उनके अधीन आ गया। हालांकि, यह क्षेत्र मुख्य रूप से जनजातीय समुदायों का निवास था, फिर भी राजनीतिक स्थिरता के लिए हर्षवर्धन ने स्थानीय शासकों को अपनी अधीनता में रखा।
  2. धार्मिक प्रभाव:
    हर्षवर्धन बौद्ध धर्म के समर्थक थे, लेकिन उन्होंने हिंदू धर्म और अन्य परंपराओं का भी सम्मान किया। उनके प्रभाव के कारण झारखण्ड के क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के प्रमाण मिलते हैं। यह क्षेत्र व्यापार मार्ग पर स्थित था, जिससे बौद्ध भिक्षुओं और यात्रियों का आगमन होता था।
  3. सांस्कृतिक प्रभाव:
    हर्षवर्धन के काल में कला, साहित्य और संस्कृति का व्यापक विकास हुआ। उनके दरबार में बाणभट्ट जैसे प्रसिद्ध लेखक थे, जिनकी रचनाओं में तत्कालीन समाज और संस्कृति का वर्णन मिलता है। झारखण्ड में भी इस काल के दौरान मंदिरों, शिलालेखों और मूर्तिकला का विकास हुआ।
  4. आर्थिक प्रभाव:
    हर्षवर्धन के शासन में व्यापारिक मार्गों का विस्तार हुआ, जिससे झारखण्ड क्षेत्र के लोहा, तांबा और अन्य खनिज संसाधनों का उपयोग बढ़ा। इससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  5. प्रशासनिक प्रभाव:
    हर्षवर्धन ने अपने विशाल साम्राज्य को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए सामंतवादी व्यवस्था अपनाई थी। झारखण्ड क्षेत्र में भी स्थानीय सरदारों को प्रशासन में शामिल किया गया, जिससे जनजातीय समूहों के साथ संवाद और नियंत्रण बना रहा।

निष्कर्ष:

हर्षवर्धन के शासनकाल में झारखण्ड क्षेत्र पर राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव पड़ा, जिसने इस क्षेत्र को व्यापक भारतीय संस्कृति से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि, झारखण्ड का जनजातीय समाज अपनी विशिष्ट परंपराओं को बनाए रखने में भी सफल रहा।

अन्य तथ्य

  • हर्यक वंश का शासक बिंबिसार झारखण्ड क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रचार करना चाहता था।
  • नंद वश के समय झारखण्ड मगध साम्राज्य का हिस्सा था।
    नंद वंश की सेना में झारखण्ड से हाथी की आपूर्ति की जाती थी। इस सेना में जनजातीय लोग भी शामिल थे।
  • झारखण्ड में दामोदर नदी के उद्गम स्थल तक मगध की सीमा का विस्तार माना जाता है।
  • झारखण्ड के ‘पलामू’ में चंद्रगुप्त प्रथम द्वारा निर्मित मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • कन्नौज के राजा यशोवर्मन के विजय अभियान के दौरान मगध के राजा जीवगुप्त द्वितीय ने झारखण्ड में शरण
    ली थी।
  • 13वीं सदी में उड़ीसा के राजा जय सिंह ने स्वियं को झारखण्ड का शासक घोषित कर दिया था।

Anshuman Choudhary

I live in Jharia area of ​​Dhanbad, I have studied till Intermediate only after that due to bad financial condition of home I started working, and today I work and write post together in free time............