मुहर्रम का इतिहास : Muharram ka itihas, history

मुहर्रम (Muharram) इस्लामिक कैलेंडर (हिजरी सन) का पहला महीना है। भारत में इसका इतिहास बेहद गहरा, उतार-चढ़ाव भरा और सांस्कृतिक विविधताओं से जुड़ा हुआ है। जहां एक ओर मुहर्रम का इतिहास मुगलों और अवध के नवाबों के दौर से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर इस महीने को लेकर समाज में कई तरह की मान्यताएं और भ्रांतियां भी फैली हुई हैं।

इस विस्तृत लेख में हम इतिहास के पन्नों को खंगालते हुए मुहर्रम की शुरुआत, इस पर लगे ऐतिहासिक प्रतिबंधों, कर्बला के वाकये और इससे जुड़ी सामाजिक मान्यताओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

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मुहर्रम और शिया-सुन्नी समुदाय का बुनियादी इतिहास

इस्लाम धर्म में दो मुख्य बड़े समुदाय हैं—सुन्नी और शिया। दोनों की पवित्र किताब ‘कुरान’, तीर्थ स्थल ‘मक्का’ और आखिरी पैगंबर ‘हजरत मोहम्मद’ एक ही हैं। हालांकि, पैगंबर मोहम्मद के बाद इस्लाम की बागडोर (उत्तराधिकारी) किसके हाथ में होगी, इसे लेकर वैचारिक अंतर आया:

  • सुन्नी समुदाय: इन्होंने पैगंबर मोहम्मद के ससुर अबू बकर को पहला खलीफा माना। इस तरह सुन्नी मुसलमानों में ‘खिलाफत’ की शुरुआत हुई।
  • शिया समुदाय: इनका मानना था कि पैगंबर मोहम्मद के चचेरे भाई और दामाद हजरत अली ही असली उत्तराधिकारी हैं। इन्हें शियाओं के पहले ‘इमाम’ का दर्जा मिला और यहाँ से ‘इमामत’ की शुरुआत हुई। हालांकि, सुन्नी मुसलमान भी हजरत अली को अपना चौथा खलीफा मानते हैं।

कर्बला की जंग (680 ईस्वी) और मुहर्रम की शहादत

मुहर्रम के इतिहास की सबसे दर्दनाक और अहम घटना इराक के कर्बला शहर से जुड़ी है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, 2 मुहर्रम को हजरत अली के बेटे और पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ कर्बला पहुंचे थे।

वहां उमय्यद वंश के शासक यजीद ने उन पर अपनी सरपरस्ती स्वीकार करने और उसके नाम की बैत (निष्ठा की शपथ) लेने का दबाव बनाया। इसके लिए इमाम हुसैन के खेमे का पानी तक बंद कर दिया गया। इमाम हुसैन ने जुल्म के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया।

10 मुहर्रम (आशूरा) के रोज यजीद की विशाल फौज के सामने इमाम हुसैन के केवल 72 साथी ढाल बनकर खड़े हुए। इस जंग में इमाम हुसैन के 6 महीने के मासूम बेटे अली असगर, 18 साल के बेटे अली अकबर और 7 साल के भतीजे कासिम समेत सभी 72 लोग शहीद हो गए। अंत में एक क्रूर खंजर से इमाम हुसैन की भी गर्दन काट दी गई। इसी जुल्म और शहादत की याद में शिया मुसलमान हर साल मुहर्रम में मातम मनाते हैं और ताजिया निकालते हैं।

भारत में मुहर्रम का आगमन और मुगलों का काल

दिल्ली सल्तनत के दौर में भारत में मुहर्रम का जिक्र बेहद कम मिलता है। सुल्तान फिरोज शाह तुगलक जैसे शासकों ने शियाओं के प्रति कड़ा रुख अपनाया था और उनकी किताबों को जलाने तक का आदेश दिया था।

भारत में बड़े स्तर पर मुहर्रम मनाने की शुरुआत मुगल काल में हुई, जिसकी कहानी बेहद दिलचस्प है:

  • हुमायूं का दौर: 1540 में चौसा की जंग में शेरशाह सूरी से हारने के बाद हुमायूं को ईरान (फारस) भागना पड़ा, जो एक शिया बहुल देश था। फारस के शाह तहमास्प की मदद से हुमायूं ने एक बड़ी फौज खड़ी की और दिल्ली का तख्त वापस पाया। इस फौज के साथ कई शिया सैनिक भारत आए, यहीं शादियां की और बस गए। यहीं से भारत में मुहर्रम के जुलूस और ताजिया निकालने की नींव पड़ी।
  • अकबर और जहांगीर का काल: अकबर के दरबार में ईरान से आए काजी नसरुल्लाह सुस्तरी का बड़ा सम्मान था। उन्होंने भारत में शिया पंथ और मुहर्रम परंपरा का काफी प्रचार किया। शिया समुदाय में उन्हें ‘शहीद-ए-सालिस’ (तीसरा शहीद) कहा जाता है। जहांगीर ने बाद में उन्हें मौत की सजा दे दी थी। हालांकि, जहांगीर की बेगम नूरجان (नूरजहाँ) और शाहजहां की बेगम मुमताज महल खुद शिया पृष्ठभूमि से थीं, इसलिए मुहर्रम शांति से मनाया जाता रहा।

मुहर्रम के जुलूस से जुड़ा ‘हॉप्सन-जॉब्सन’ का किस्सा

ब्रिटिश काल के दौरान जब अंग्रेज भारत आए, तो उन्हें मुहर्रम के जुलूस में ‘या हसन, या हुसैन’ के नारे सुनाई देते थे। ब्रिटिशर्स अपनी अंग्रेजी जुबान के कारण इस नारे को सही से नहीं बोल पाते थे और उन्होंने इसे बिगाड़कर ‘हॉप्सन-जॉब्सन’ (Hobson-Jobson) कहना शुरू कर दिया। बाद में दो ब्रिटिश अफसरों ने भारतीय शब्दों के अंग्रेजी में बदलते रूप पर एक मशहूर डिक्शनरी लिखी, जिसका नाम उन्होंने यही ‘हॉप्सन-जॉब्सन’ रखा।

औरंगजेब का प्रतिबंध और लखनऊ में मुहर्रम का केंद्र

मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में मुहर्रम को लेकर स्थितियां बदल गईं। औरंगजेब के दौर में मुहर्रम के जुलूसों के दौरान कई संवेदनशील इलाकों में शिया और सुन्नी समुदायों के बीच हिंसक दंगे और आपसी टकराव होने लगे।

साल 1669 में औरंगजेब ने कानून-व्यवस्था और सुरक्षा का हवाला देते हुए मुहर्रम के सार्वजनिक जुलूसों और ताजियों पर पूरी तरह से प्रतिबंध (बैन) लगा दिया।

अवध (लखनऊ) बना ‘मरकज-ए-अजादारी’

मुगलों के कमजोर होने के बाद मुहर्रम का मुख्य केंद्र दिल्ली से हटकर अवध (लखनऊ) बना। अवध के नवाब शिया समुदाय से थे। नवाब आसफ-उद-दौला के दौर में लखनऊ के मुहर्रम को वैश्विक प्रसिद्धि हुई, जो एक मुहर्रम पर करीब 5-6 लाख रुपये तक खर्च किया करते थे। उन्होंने ही लखनऊ का ऐतिहासिक ‘बड़ा इमामबाड़ा’ बनवाया।

यहाँ के मुख्य हॉल में एक ‘खरबूज वाला कमरा’ है, जिसके पीछे एक बूढ़ी तरबूज बेचने वाली महिला की जिद की कहानी है। उसने अपनी जमीन इमामबाड़े के लिए तभी दी, जब नवाब ने शर्त मानी कि उसका अदना सा ‘ताजिया’ भी नवाब के शाही ताजिये के साथ इमामबाड़े में रखा जाएगा।

मुहर्रम से जुड़े सामाजिक अंधविश्वास और भ्रांतियां

वर्तमान समाज में मुहर्रम के महीने को लेकर कई तरह की भ्रांतियां और अंधविश्वास फैल चुके हैं, जिन पर इस्लामिक विद्वानों ने विस्तार से स्पष्टीकरण दिया है। इस्लाम के अनुसार, किसी भी समय या महीने को मनहूस मानना गलत अकीदा है।

  • मुहर्रम के महीने में शादी न करना: कई लोग मुहर्रम को पूरी तरह अशुभ या सिर्फ मातम का महीना मानकर इसमें अपने बच्चों की शादी (निकाह) करने से बचते हैं। विद्वानों के अनुसार, यह अल्लाह का एक मुबारक महीना है जिसमें मूसा अलैहिस्सलाम को फिरौन के जुल्म से निजात मिली थी। इस महीने में निकाह न करना केवल एक सामाजिक वहम और भ्रांति है।
  • बदशगुनी और अंधविश्वास: मुहर्रम के पवित्र महीने का संदेश समाज से अंधविश्वासों को खत्म करना है। बच्चों को नजर से बचाने के लिए काला धागा या काजल का टीका लगाने के बजाय धार्मिक तौर पर सही दुआएं और कुरान की सूरतें (सूरह फातिहा, सूरह फलक, और सूरह नास) पढ़कर दम करना ही सही तरीका माना गया है। शरीर पर टैटू बनवाना या जिस्म दगवाना भी पूरी तरह वर्जित है।
  • इबादत और पवित्रता का महत्व: मुहर्रम के इस महीने में इबादत, नमाज और पवित्रता का विशेष महत्व है। किसी भी धार्मिक इबादत की स्वीकार्यता के लिए सही तरीके से और पानी को बिना बर्बाद किए सुन्नत विधि से वजू (Wudu) करना अनिवार्य है। वजू के बाद सही अकीदे के साथ अल्लाह की बारगाह में की गई दुआएं इंसान के लिए जन्नत के रास्ते खोलती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)

मुहर्रम का इतिहास हमें जहां विपरीत परिस्थितियों में भी हक, सच्चाई और मानवता पर अडिग रहने की सीख देता है, वहीं हमें यह भी सिखाता है कि धर्म के नाम पर आपसी दंगों, कुप्रथाओं या अंधविश्वासों से दूर रहना चाहिए। इमाम हुसैन की शहादत का असल संदेश समाज में शांति, न्याय और सही धार्मिक मूल्यों को स्थापित करना है।