परिचय (लॉर्ड लिटन कौन था?) लॉर्ड लिटन के कार्य और नीतियां: लॉर्ड लिटन का इतिहास और उसके विवादित फैसले

1857 की क्रांति के कुछ सालों बाद (लॉर्ड नॉर्थब्रुक के बाद), लॉर्ड लिटन भारत का वायसराय (ब्रिटिश सरकार का मुख्य अधिकारी) बनकर आया। उसे ब्रिटेन की ‘डिजरायली’ (Dizraeli) सरकार ने भारत भेजा था। वह अपनी सरकार की तरह ही आक्रामक और आगे बढ़कर फैसला लेने वाली सोच (Forward Policy) रखता था। उसके शासनकाल को मुख्य रूप से दो चीज़ों के लिए जाना जाता है: भारत के अंदरूनी सुधार और मध्य एशिया (पड़ोसी देशों) से जुड़ी नीतियां। lord lytton history in hindi

1876-78 का भीषण अकाल और ‘स्ट्रैची कमीशन’ का गठन

लॉर्ड लिटन के भारत आते ही देश को एक बहुत बड़े संकट का सामना करना पड़ा—एक भयानक सूखा और अकाल पड़ा। असर: करीब 5 करोड़ लोग इस अकाल से प्रभावित हुए और लाखों लोगों की भूख से मौत हो गई। इतिहासकार डॉ. आर.सी. दत्त के अनुसार, एक ही साल में करीब 50 लाख लोग भूख के कारण मर गए। कई गाँव और बस्तियाँ पूरी तरह उजड़ गईं। लिटन का कदम (स्ट्रेची कमीशन): इस स्थिति से निपटने के लिए 1880 में रिचर्ड स्ट्रेची की अध्यक्षता में एक ‘अकाल आयोग’ (Famine Commission) बनाया गया।

आयोग के सुझाव: जो गरीब लोग काम नहीं कर सकते, उन्हें मुफ्त में मदद दी जाए। जो लोग काम कर सकते हैं, उन्हें काम (रोजगार) दिया जाए और बदले में मजदूरी दी जाए। हर राज्य में एक ‘अकाल कोष’ (Famine Fund) बनाया जाए ताकि मुसीबत में पैसा काम आ सके। काम की शुरुआत: लोगों को रोजगार देने के लिए रेलवे लाइन और नहरों को बनाने का काम शुरू किया गया। इससे हजारों लोगों को फायदा हुआ और धीरे-धीरे इस भयानक स्थिति पर काबू पाया गया।

अबाध व्यापार की नीति (Free Trade Policy): भारत को नुकसान, इंग्लैंड को फायदा

लॉर्ड लिटन ‘मुक्त व्यापार’ (बिना किसी टैक्स या रुकावट के व्यापार) का समर्थक था। लेकिन यह नीति भारत के फायदे के लिए नहीं, बल्कि इंग्लैंड के फायदे के लिए बनाई गई थी।

  • इंग्लैंड का फायदा: इंग्लैंड के (खासकर लंकाशायर के) कपड़ा व्यापारी भारत के मुंबई में खुल रहे सूती कपड़े के कारखानों से जलते थे। वे चाहते थे कि भारत में इंग्लैंड से आने वाले कपड़े पर कोई टैक्स न लगे, ताकि उनका कपड़ा भारत में आसानी से और सस्ता बिक सके।
  • लिटन का फैसला: ब्रिटिश संसद के दबाव और अपनी खुद की सोच के कारण लिटन ने मुक्त व्यापार की नीति अपनाई। उसने करीब 29 चीजों पर से आयात शुल्क (Import Duty/टैक्स) हटा दिया
  • नतीजा: इससे इंग्लैंड के व्यापारियों और उद्योगों को तो बहुत फायदा हुआ, लेकिन भारत की आर्थिक व्यवस्था पर इसका बहुत बुरा और नुकसानदेह असर पड़ा

संक्षेप में कहें तो: लॉर्ड लिटन का शासनकाल भारत के लिए काफी मुश्किलों भरा रहा, जहाँ एक तरफ देश भयानक अकाल से जूझ रहा था, वहीं दूसरी तरफ उसकी आर्थिक नीतियों से भारतीय उद्योगों को नुकसान और ब्रिटिश व्यापारियों को फायदा पहुँच रहा था।

वित्तीय सुधार (पैसों से जुड़े बदलाव)

लॉर्ड लिटन ने देश की आर्थिक व्यवस्था को संभालने के लिए कुछ नए नियम बनाए:

  • राज्यों को आत्मनिर्भर बनाना (Financial Decentralization): लिटन ने तय किया कि प्रांतीय सरकारों (राज्य सरकारों) को अपने खर्च खुद उठाने होंगे। उसने कहा कि जमीन से मिलने वाला टैक्स (भूमि-कर), उत्पादन टैक्स, आबकारी (Excise) और अदालती टिकटों से जो कमाई होगी, उसी से राज्य अपने यहाँ का प्रशासन और कानून-व्यवस्था चलाएं। केंद्र सरकार से मिलने वाली सीधी मदद (अनुदान) बंद कर दी गई।
  • मुनाफे का बंटवारा: अगर राज्यों के पास खर्च के बाद पैसा बच जाता, तो उसका आधा हिस्सा केंद्र सरकार को देना होता था। हाँ, अगर किसी राज्य का खर्च पूरा नहीं हो पाता, तो केंद्र उसकी मदद जरूर करता था।
  • नमक पर एक जैसा टैक्स: लिटन का दूसरा बड़ा काम था—पूरे भारत में नमक पर एक समान टैक्स (Uniform Salt Tax) लगाना और नमक की तस्करी (चोरी-छिपे व्यापार) को रोकना। उसने नमक बनाने का पूरा अधिकार केंद्र सरकार के हाथों में ले लिया और जिन देसी रियासतों को इससे नुकसान हुआ, उन्हें हर्जाना (मुआवजा) दिया।

शैक्षणिक सुधार (शिक्षा में बदलाव)

लिटन ने शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी कुछ अच्छे प्रयास किए। उसी के सहयोग और प्रयासों के कारण अलीगढ़ में ‘मुस्लिम-एंग्लो महाविद्यालय’ (Muslim-Anglo Oriental College) की स्थापना हुई। यही कॉलेज आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) बना, जो आज भी भारत में शिक्षा का एक बहुत बड़ा और खास केंद्र है।

राज-उपाधि अधिनियम और दिल्ली दरबार (एक बड़ा विवाद) :1877 का शाही दिल्ली दरबार: जब भूख से मरती जनता के बीच बहाया गया पानी की तरह पैसा

यह लॉर्ड लिटन का सबसे ज्यादा विवादित और आलोचना वाला काम था।

  • महारानी को उपाधि: जनवरी 1877 में ब्रिटिश संसद के एक कानून (Royal Titles Act 1876) के तहत ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को ‘कैसर-ए-हिंद’ (भारत की सम्राज्ञी/महारानी) की उपाधि दी गई।
  • शाही दिल्ली दरबार: इस उपाधि का ऐलान करने के लिए लिटन ने 1 जनवरी 1877 को दिल्ली में एक बहुत ही भव्य और आलीशान ‘दिल्ली दरबार’ का आयोजन किया, जिसमें देश भर के राजा-महाराजा शामिल हुए।
  • विवाद और गुस्सा क्यों हुआ?: उस समय पूरा भारत भयानक अकाल और भुखमरी से जूझ रहा था, लोग दाने-दाने को तरस रहे थे। ऐसे समय में पानी की तरह पैसा बहाकर ऐसा तड़क-भड़क वाला जश्न मनाना, भारतीय जनता के मुंह पर तमाचे जैसा था। इतिहासकारों के अनुसार, इस घटना ने भारतीयों के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाई और उनके अंदर अंग्रेजों के खिलाफ गुस्से और देशभक्ति की भावना को और तेज कर दिया।

भारतीय भाषा समाचार पत्र अधिनियम (Vernacular Press Act) : वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट 1878: जब भारतीय अखबारों की आवाज को दबाया गया

लॉर्ड लिटन की इन अजीब नीतियों और अकाल के समय किए गए फिजूलखर्च की भारतीय अखबारों में जमकर आलोचना (बुराई) हुई। जनता में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा बढ़ने लगा, मुंबई में दंगे हुए और लिटन की अफगान नीति (पड़ोसी देश से युद्ध की नीति) पर भी सवाल उठने लगे। (इसी आलोचना को दबाने के लिए उसने बाद में भारतीय भाषाओं के अखबारों पर पाबंदी लगाने वाला कड़ा कानून बनाया था)।

संक्षेप में कहें तो: जहाँ एक तरफ लिटन ने टैक्स व्यवस्था को सुधारा और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की नींव रखने में मदद की, वहीं दूसरी तरफ अकाल के समय ‘दिल्ली दरबार’ जैसा भारी खर्च करके उसने भारतीय जनता का दिल दुखाया और खुद को एक क्रूर शासक के रूप में स्थापित किया।

लॉर्ड लिटन की गलत नीतियों की जब भारतीय अखबारों ने आलोचना की, तो कोलकाता के एक अखबार ने लिखा: “नीरो बंसी बजा रहा था और रोम जल रहा था।” (यानी जब भारत के लोग अकाल से मर रहे थे, तब लिटन दिल्ली दरबार में जश्न मना रहा था)। इन आलोचनाओं से गुस्सा होकर लिटन ने भारतीय जनता को दबाने के लिए कई कड़े कानून बनाए:

भारतीय भाषा समाचार पत्र अधिनियम, 1878 (Vernacular Press Act)

  • क्या था कानून: लिटन ने भारतीय भाषाओं (जैसे हिंदी, बांग्ला आदि) के अखबारों पर पाबंदी लगा दी। नियम बनाया कि कोई भी अखबार ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कुछ नहीं छापेगा।
  • असर: अगर कोई सरकार विरोधी खबर छापता, तो सरकार उसका छापाखाना (प्रेस) जब्त कर सकती थी। इस कानून ने भारतीय मीडिया को पूरी तरह अंग्रेजों का दुश्मन बना दिया।

भारतीय अस्त्र/शस्त्र अधिनियम, 1878 (Arms Act) : हथियारों को लेकर भारतीयों से भेदभाव

  • क्या था कानून: इस कानून के तहत किसी भी भारतीय के लिए बिना लाइसेंस के हथियार (जैसे बंदूक, तलवार) रखना या उसका व्यापार करना एक गंभीर अपराध बना दिया गया। नियम तोड़ने पर जेल और जुर्माने की व्यवस्था थी।
  • भेदभाव: सबसे बड़ी बात यह थी कि यह कानून सिर्फ भारतीयों पर लागू होता था। भारत में रहने वाले गोरों (यूरोपियनों और एंग्लो-इंडियनों) को बिना लाइसेंस हथियार रखने की पूरी छूट थी। इससे भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति नफरत और बढ़ गई।

वैधानिक जनपद सेवा अधिनियम (Statutory Civil Service Act) : सिविल सर्विस में उम्र घटाकर 19 वर्ष की: भारतीयों को नौकरी से रोकने की चाल

यह भारतीयों को बड़ी सरकारी नौकरियों (जैसे IAS/ICS) से दूर रखने की चाल थी।

  • पहले उच्च पदों की परीक्षा लंदन में होती थी, जहाँ बहुत कम भारतीय पास हो पाते थे। लिटन ने भारतीयों के लिए एक अलग ‘प्रांतीय सेवा’ बनाई, जिसमें केवल अमीर या चाटुकार ऊंचे खानदान के लोगों को ही अंग्रेजों की सिफारिश पर नौकरी मिल सकती थी।
  • उम्र घटाना: उसने परीक्षा में बैठने की अधिकतम उम्र 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी। इसका सीधा मतलब था कि भारतीय छात्र तैयारी ही न कर पाएं। इससे आम पढ़े-लिखे भारतीयों के लिए सरकारी नौकरी के दरवाजे बंद हो गए।

लिटन की विदेश नीति (अफगानिस्तान से युद्ध)

  • लिटन ने अफगानिस्तान के अमीर ‘शेर अली’ के पास अपना एक दल भेजा, जिसे शेर अली ने वापस लौटा दिया।
  • इससे नाराज होकर लिटन ने पुरानी शांत नीति छोड़कर आक्रामक नीति (Forward Policy) अपनाई। नवंबर 1878 में उसने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया (द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध)। शेर अली हार कर भाग गया और उसके बेटे याकूब खाँ ने अंग्रेजों के साथ ‘गंडमक की संधि’ करके शांति स्थापित की। इस युद्ध में भारी जान-माल का नुकसान हुआ, जिसकी बहुत आलोचना हुई।

लॉर्ड लिटन का मूल्यांकन (निचोड़)

  • लिटन 1876 से 1880 तक भारत का वायसराय रहा। 1880 में जब ब्रिटेन में उसकी पार्टी कंजरवेटिव चुनाव हार गई, तो उसने इस्तीफा दे दिया।
  • एक व्यक्ति के रूप में: वह एक अच्छा लेखक, साहित्यकार, कवि और कूटनीतिज्ञ था। लेकिन वह एक विवादस्पद व्यक्ति थे। लिटन में अनेक योग्यताएं थी, उसने पूर्णवर्णीत कार्यों के अतिरिक्त एकमलग उत्तर pashichami सीमा प्रांत के भारतीय राजाओ की प्रिवी कौंसिल बनाए एवं भारत की आर्थिक व्यवस्था में स्वर्णस्तर स्थापित करने की भी योजना बनाई थी। जो उसके समय में पशुरू नहीं हो सकी।
  • एक शासक के रूप में: अंग्रेजों के लिए तो वह वफादार था, लेकिन भारतीयों के लिए उसका शासनकाल बेहद क्रूर, दमनकारी और अन्यायपूर्ण था। उसे लंबा प्रशासनिक अनुभव प्राप्त था। वह ब्रिटिश सरकार के हितों का सच्चा अफसर था, लेकिन भारतीय दृष्टिकोण से लोटन के कार्य बहुत ही अनुचित और निंदनीय थे। उसकी अप्रिय और दमनकारी नीतियों से भारत के लोगों में गुस्सा उत्पन्न कर दिया था। प्रतिरोध की भावना लोगों में बढ़ती गई, दिल्ली दरबार, प्रेस और शस्त्र अधिनियम, वैधानिक नागरिक सेवा सबंधी नीतियों ने ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीयों की घृणा को बढ़ावा ही दिया। उसकी अफ़गान नीति की भी आलोचना हुई।
  • इतिहासकारों का मानना है: लिटन की इसी दमनकारी नीति ने अनजाने में भारतीयों के अंदर सोए हुए ‘देशप्रेम’ और ‘एकता’ को जगा दिया। लोग अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने लगे। इसकी दमनकारी नीति से भारतीय समाज में नई जागृति पैदा कर दी। एयर इच्छा न होते भी लिटन ने भारत का उपकार ही किया।