झारखंड में ईसाई मिशनरियों का आगमन से आदिवासियों पर क्या प्रभाव पड़ा | Arts (I. com) Semester 3 झारखंड का इतिहास (history)

झारखण्ड में ईसाई मिशनरियों क्या क्या योगदान है?

ईसाई मिशनरियों द्वारा ही सबसे पहले झारखण्ड में स्कूल खोले गए

ईसाई मिशनरियों का झारखण्ड में आदिवासियों और ग्रामीण इलाको के बच्चो को सबसे पहले शिक्षा देने काम ईसाई मिशनरियों ने ही शुरू किया। झारखण्ड में सबसे पहले विद्यालयों खोलने का श्रेय ईसाई मिशनरियों को ही जाता है, ईसाई मिशनरियों ने झारखण्ड में बहुत से स्कूलों का निर्माण करवाया। घर जाकर जाकर ईसाई मिशनरियों के प्रचारक उसके माता पिता से मिलकर बच्चों पढ़ने के लिए प्रेरित किया करते थे। जिसमें वे कई बार असफल भी हो जाते समझाते समझाते लेकिन उनके परिवार वाले राजी नहीं होते थे।

लेकिन ईसाई मिशनरियों ने लगतार अपना प्रयास जारी रखा और धीरे धीरे बच्चे पढ़ने के लिए विद्यालय आने शुरू कर दिए।

गोस्सनर इबेनजेलिकल लूथेरन चर्च मिशन ( G.E.L. Church Mission) – झारखण्ड के छोटानागपुर में ईसाई धर्म के फैलाने में गोस्सनर इबेनजेलिकल लूथेरन चर्च मिशन का सबसे बड़ा हाथ है। छोटानागपुर के कुछ ब्रिटिश अधिकारियों के Order से कोलकाता के बिशप ने 2 नवंबर सन् 1845 ईस्वी को छोटा नागपुर में ईसाई धर्म के प्रचार प्रसार के लिए कुछ धर्म प्रचारकों को भेजा गया था।

ईसाई मिशनरियों द्वारा ही सबसे पहले झारखण्ड में स्कूल खोले गए

झारखंड के जनजातीय क्षेत्रो में औपचारिक शिक्षा की शुरुआत सबसे पहले ईसाई मिशनरियों द्वारा ही की गई थी। झारखंड के जनजातियों इलाकों में शिक्षा के प्रसार में अलग अलग कई इसाई मिशनरियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

गोस्सनर मिशन द्वारा रांची में सबसे पहले एक विद्यालय की स्थापना की गई थी, जिस विद्यालय में शुरू शुरू में छात्र दाखिला लेने में कुछ खास इंटरेस्ट नहीं दिखा रहे थे। और स्कूल संचालको को शुरू शुरू में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने दिमाग लगाया विद्यालय में आदिवासी छात्र छात्राओं को ज्यादा से ज्यादा आकर्षित करने के उद्देश्य से ज्यादा से ज्यादा दाखिला करने के लिए विद्यालय में आने वाले हर लड़के लड़कियों को प्रत्येक सप्ताह के अंत में एक आना या यानी 6 पैसा प्रतिदिन की उपस्थिति (Present) की दर से छात्रवृत्ति दी जाती थी कि जिससे ज्यादा से ज्यादा विद्यालय पढने के लिए छात्र छात्राएं आये।

फिर भी विद्यालय के संचालको को समस्या आ रही थी क्योंकि आदिवासी छात्र छात्राएं फिर भी आने को तैयार नहीं हो रहे थे। तो ईसाई धर्म के प्रचारक विद्यालय के लिए प्रत्येक दिन सुबह में हर किसी के घर जाकर आदिवासी बच्चों को एकत्रित करते थे और उसे समझाते थे। बच्चों को पढ़ाने के लिए विद्यालय भेजना आदिवासियों की के लिए एक नई परंपरा जैसी थी। इसलिए उनके माता-पिता भी अपने बच्चों को विद्यालय भेजने में थोड़ा संकोच हो रहा था जिस कारण वह अपने बच्चों को विद्यालय नहीं भेज रहे थे।

ईसाई मिशनरी बच्चो को क्या पढ़ाते थे और क्या सिखाते थे?

ईसाई मिशनरियों के धर्म के प्रचारक ने अपना धैर्य नहीं खोया और वह अपने काम में लगातार लगे रहे। और परिणामस्वरूप सन् 1855 ईस्वी में रांची स्कूल के छात्रों की संख्या बढ़कर 80 के करीब हो चुकी थी। सन् 1857 ईस्वी में जब बिहार के विद्यालय के निरीक्षक मिस्टर हैरिसन इस विद्यालय में निरीक्षण के लिए आए तो उन्होंने देखा कि विद्यालय में छात्र छात्राओं का अनुपात लगभग एक समान है। और सभी छात्र छात्राएं ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके हैं। इस विद्यालय में हिंदी, अंग्रेजी उर्दू ,भूगोल और अंकगणित पढ़ाया जा रहा था, छात्रों को बर्तन बनाने तथा साथ में नक्काशी करने का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा था।

और पढ़ाई के साथ-साथ छात्राओं को सिलाई भी सिखाई जा रही थी, विद्यालय भवन का कमरा बड़ा था जिसमे नक्शा तथा पुस्तकों से सजाया गया था। सन् 1857 ईस्वी की क्रांति के समय ईसाई धर्म प्रचारकों ने रांची से भाग गए और वे कोलकाता लौट गए। परिणाम स्वरुप ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित विद्यालय कुछ वक्त के लिए बंद हो चुकी थी। जब स्थिति सामान्य हुई तो ईसाई मिशनरियों ने धर्म प्रचारकों ने पुनः अपने शिक्षा कार्यक्रम को तेजी के साथ चलाना शुरू कर दिया था। और वह सन् 1864 ईसवी के अंत तक छोटानागपुर के विभिन्न इलाको में 11 विद्यालयों की स्थापना करने में सफलता हासिल की।

ईसाई मिशनरियों की स्कूल की Fee क्या थी?

ईसाई मिशनरियों के धर्म प्रचारको ने हर वैसे गांव में एक एक विद्यालय खोलने का फैसला लिया जहां कम से कम 20 ईसाई परिवार रहते थे। सन् 1871 से 1सन् 1872 ईस्वी तक रांची में लड़कों तथा लड़कियों के लिए अलग से एक एक आवासीय विद्यालय (Residential school) की स्थापना की जा चुकी थी। जिसमे शिक्षकों में दो को छोड़कर सभी भारतीय ईसाई थे केवल एक बंगाली शिक्षक थे जो अंग्रेजी पढ़ाया करते थे। जबकि एक पंडित शिक्षक थे जो हिंदी पढ़ाते थे, छात्रों को गाना, पढ़ना तथा हिंदी तथा अंग्रेजी में लिखना सीखलाया जाता था।

इसके अलावा चित्रांकन अंकगणित तथा भूगोल के साथ साथ बाइबल के पाठ्यक्रम भी पढ़ाए जा रहे थे,1872 ईस्वी तक विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा दी जा रही थी।

किंतु सन् 1873 ईस्वी के बाद स्कूल वालों ने शुल्क (fee) लेना शुरू कर दिया था। किंतु इस पर विद्यालय पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा था, जो छात्र विद्यालय शुल्क (fee) नहीं दे सकते थे वो विद्यालय छोड़ कर चले जाते थे। सन् 1874 ईस्वी में निर्धन गरीब तथा अनाथ बच्चों को विद्यालय में शिक्षा मुक्त कर दिया गया। आवासीय बालिका विद्यालय (residential girls school) की छात्राओं पर fee लगाया गया। छात्राओं को अपना भोजन खुद बनाना पड़ता था, छात्रावास (Hostel) में कुछ महीने ठहरने के बाद लड़कों की अपेक्षा लड़कियां अपने घर भाग जाया करती थी।

फसल कटनी के मौसम में विद्यालय बंद कर दी जाती थी, ताकि बच्चे खेतों में अपने माता-पिता की फसल काटने में मदद कर सके। और उसी समय ग्रामीण विद्यालयों के शिक्षकों को कुछ समय के लिए प्रशिक्षण के लिए रांची भेज दिया जाता था। लोहरदगा के छात्रों की प्रगति बहुत धीमी थी, क्योंकि विद्यालय के अनुशासन के कारणों में क्लास में बंद रहना पड़ता था। जो जंगलों में आजादी से घुमने वाला लड़का था अब वो एक कमरे में बंद था।

गोस्सनर मिशन सन् 1874 ईस्वी के वार्षिक रिपोर्ट (report) से पता चलता है कि सन् 1874 ईस्वी तक रांची के अलावा रांची जिले के 62 गाँवों में मिशन विद्यालय चलाए जा रहे थे, जिसमें 1314 विद्यार्थी शिक्षा ले रहे थे।

छोटानागपुर में पहला प्रकाशित की गई पत्रिका कौन सी थी?

सन् 1873 ईस्वी में गोस्सनर मिशन द्वारा रांची में स्टोन लियाग्रेफिक प्रेस खोला गया, जो सन् 1882 ईस्वी में इसे छापखाना के रूप में बदल दिया गया, यहां कुरुख मुंडारी तथा हिंदी में पुस्तकें छापी जाती थी। स्टोन लियाग्रेफिक प्रेस छापखाना को छोटानागपुर में घर-बंधु नामक प्रथम हिंदी पत्रिका को प्रकाशित करने का श्रेय प्राप्त है। जो सन् 1877 ईस्वी में दो हफ्ते में एक बार प्रकाशित की जाती थी।

सन् 1868 ईस्वी में रेव हाॅन ने कुरुख में व्याकरण तथा एक छोटा सा कुरुख शब्दकोश का निर्माण किया। फ्लेक्स के कुरुख व्याकरण तथा शब्दकोश को काफी लोकप्रियता मिली। उन्होंने कुरुख वर्णमाला तैयार कर कुरुख भाषा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। रेव हाॅन ने बाइबल की छोटी कहानियों का कुरुख में अनुवाद किया।

ईसाई मिशनरियों ने झारखण्ड में स्कूलों का विस्तार कैसे किया?

ईसाई मिशनरियों द्वारा सन् 1896 ईस्वी में रांची में गोस्सनर उच्च विद्यालय की स्थापना की गई जिसे कोलकाता विश्वविद्यालय से संबद्ध (affiliated) किया गया ईसाइयों के अलावा हिंदू मुस्लिम को भी विद्यालय में दाखिला दिया जाने लगा था। सन् 1905 ईस्वी में यहां लड़को की कुल संख्या 91 गई थी, जो 1914 में बढ़कर 250 हो गई। 1916 ईस्वी में 150 छात्रों के लिए एक छात्रावास (Hotel) भी बनवाया गया, छात्रावास में रहने वाले को उस वक़्त ₹3 शुल्क (Fee) देनी पड़ती थी।

सन् 1896 ईसवी के अंत तक ईसाई मिशनरियों द्वारा 80 उच्च प्राथमिक तथा 86 ग्रामीण विद्यालय चल रहे थे। 1914 ईस्वी में प्रथम विश्व युद्ध से पहले विद्यालयों की कुल संख्या 295 हो चुकी थी, जिसमें 8023 छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे थे।

जनजातीय भाषा तथा साहित्य के विकास के दिशा में भी गोस्सनर मिशन के द्वारा प्रयास किया गया। 1902 ईस्वी में एक कुरुख अंग्रेजी शब्दकोष तैयार किया। कुरुख कहावतों तथा अनुश्रुतियों (recitations) का एक संकलन तैयार किया। 1909 – 1919 ईस्वी के दौरान गोस्सनर मिशन वित्तीय संकट (Financial Crisis) की स्थिति से गुजर रहा था। जिसका विपरित प्रभाव इसके द्वारा संचालित संस्थाओं पर भी पड़ा रहा था। बाद में इस Financial Crisis परिस्थितियों पर काबू पा लिया गया। इस मिशनरी के गिरजाघरो द्वारा 208 प्राथमिक विद्यालय चलाए जा रहे थे।

जिसमें करीब 6246 विद्यार्थी अध्ययनरत (studying) कर रहे थे। मिशनरी इन विद्यालयों का बोझ सहन करने में अपने को असमर्थ पा रहा था। इसलिए 1932 ईस्वी तक 93 प्राथमिक विद्यालय जिला बोर्ड को handed over (सुपुर्द) कर दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1942 ईस्वी में जी. ई. एल. मिशन (G. E. L. Mission) के अंतर्गत 2 उच्च विद्यालय 9 मध्य विद्यालय और 109 प्राथमिक विद्यालय थे। जिसमें 2257 छात्र तथा 423 छात्राएं अध्ययन कर रहे थे। 1971 ईस्वी में रांची में एक गोस्सनर महाविद्यालय की स्थापना की गई जो रांची विश्वविद्यालय से संबद्ध (affiliated) किया गया।

एस. पी. जी. मिशन ( S. P. G. Mission – The Society for the Propagation of Gospel) के द्वारा झारखण्ड कार्य

1869 एस. पी. जी. मिशन (दि सोसाइटी फॉर दी प्रोपगेशन ऑफ गॉस्पेल) ने छोटा नागपुर में अपनी गतिविधियों का शुभारंभ किया तथा 5 वर्ष के अंदर अपनी स्थिति को काफी मजबूत की। इस मिशन के द्वारा बच्चों के लिए विद्यालय तथा श्रमिकों के लिए रात्रि विद्यालय चलाए जाते थे। सन् 1870 ईसवी के अंत तक S. P. G. मिशन ने ग्रामीण क्षेत्र में 12 विद्यालयों की स्थापना दी थी, जिसे सरकार द्वारा भी आर्थिक सहायता मिल रही थी। यह विद्यालय रांची के सेंट्रल बोर्डिंग स्कूल के लिए पोषक विद्यालय के रूप में काम करते थे,

इन विद्यालयों में विद्यार्थियों की कुल संख्या करीब 219 थी। रांची के आवासीय विद्यालय को आकर्षित करना बहुत कठिन हो रहा था,

इस विद्यालय का मुख्य आकर्षण जनजातीय बच्चों के लिए मुक्त कपड़े की व्यवस्था थी। उसके अभिभावक शिक्षा को ज्यादा महत्व नहीं देते थे बहुत से बच्चे एक या 2 महीने के बाद आवासीय विद्यालय छोड़ देते थे। रांची आवासीय विद्यालय में अप्रैल सन् 1869 ईस्वी में 60 छात्र तथा 40 छात्राएं थी, जो सन् 1870 ईस्वी में बढ़कर क्रमश: 107 और 50 हो गई। रांची आवासीय विद्यालय में ईसाई धर्म के उपदेश हिंदी अंकगणित तथा गाना सिखलाए जाते थे। इन विषयों के अलावा प्रथम तथा दूसरी कक्षा के विद्यार्थियों को व्याकरण तथा भूगोल भी पढ़ाए जाते थे।

तथा प्रत्येक दिन एक घंटा अंग्रेजी भी सीख लाई जाती थी, शिक्षकों को भी प्रत्येक दिन विद्यालय के समय के बाद शिक्षण में अभिवृद्धि(growth) के लिए प्रशिक्षण दिए जाते थे।

ईसाई मिशनरियों द्वारा गैर – ईसाई शिक्षकों को हटाना

मार्च सन् 1873 ईस्वी में रांची आवासीय विद्यालय में 118 छात्र तथा 62 छात्राएं थी जिसमें 48 दीवा छात्र (Day scholar) थे। विद्यालय में 10 कक्षा थी और हर कक्षा के लिए एक शिक्षक हुआ करते थे, उच्च कक्षाओं में हिंदी पढ़ाने वाले एक पंडित को छोड़कर बाकी के शिक्षक ईसाई ही रहते थे। सन् 1880 ईस्वी में एस. पी. जी. मिशन ने केवल ईसाई शिक्षकों की नियुक्ति करने का नियम बनाया जिसके फलस्वरूप गैर – ईसाई शिक्षकों की नियुक्ति अस्थाई (temporary) समय के लिए कर दी गई थी।

और गैर – ईसाई शिक्षक मिलते हैं उन्हें हटाया जाने लगाथा, जिसके कारण 5 वर्ष के दौरान रांची आवासीय विद्यालय में इस नियम के कारण गैर ईसाई विद्यार्थियों की संख्या घट रही थी और 263 से घटकर 19 ही रह गई।

ग्रामीण क्षेत्रों के इलाको के विद्यालय की स्थिति ठीक नहीं थी, हर वर्ष छात्रों की संख्या घट रही थी, और लगातार घटती ही जा रही थी। रांची आवासीय विद्यालय में दिवा छात्रों की संख्या में वृद्धि होने लगी। सन् 1883 ईस्वी में कोई भी दिवा छात्र नहीं था, जबकि सन् 1889 ईस्वी में सभी के सभी दीवा छात्र हो गए। सामान्य कक्षाओं के लिए धर्म विज्ञान, अंग्रेजी, गणित, बीजगणित भारत तथा इंग्लैंड के इतिहास तथा भूगोल की पढ़ाई होती थी।

झारखण्ड में ईसाई मिशनरियों के द्वारा स्थापित की गई विद्यालय (School)

1908 ईस्वी में सेंट पॉल उच्च विद्यालय से 6 विद्यार्थी प्रवेशिका परीक्षा में शामिल हुए, और अच्छे से परीक्षा में उत्तीर्ण भी हुए। इस विद्यालय में 350 विद्यार्थी थे जिनमें से 147 छात्रावास (Hostel) में रहते थे, सन् 1914 ईस्वी में इस विद्यालय में 400 विद्यार्थी थे।

  • सन् 1898 ईस्वी में रेव तथा मिस्ट्रेस ओ कॉर्नर द्वारा सेंट माइकल अंधविद्यालय की स्थापना की गई, जहां अंधों को दस्तकारी तथा बेंत की कुर्सियां बनाना सिखाया जाता था। बाद में यहां कुछ अंधी महिलाओं को भी दाखिला लिया जाने लगा, बांस तथा बेंत की कुर्सियां बनाने के आलावा उन्हें बुनाई, सिलाई, कशीदाकारी का भी प्रशिक्षण दिया जाता था। 1967 ईस्वी में इस विद्यालय में कुल विद्यार्थियों की संख्या करीब 67 थी जिसमें अधिकांश उरांव जनजाति के थे।
  • ईसाई मिशनरियों द्वारा 2 जनवरी सन् 1901 ईस्वी में चुटिया बालक विद्यालय की स्थापना की गई 1908 ईसवी में एक लेस विद्यालय खोला गया। इसके बाद 1909 ईस्वी में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से एक महिला प्रशिक्षण विद्यालय प्रारंभ किया गया। 1918 ईस्वी तक बालिका विद्यालयों की संख्या बढ़कर 23 हो गई, जिसके अंतर्गत 1122 छात्राएं शिक्षा प्राप्त कर रही थी।
  • सन् 1908 ईस्वी में एस. पी. जी. मिशन द्वारा 118 विद्यालय संचालित किए जा रहे थे, जिसके अंतर्गत करीब 4148 विद्यार्थी 158 शिक्षक तथा 56 शिक्षिकाएं थी। प्रथम विश्व युद्ध के प्रारंभ होने तक विद्यालयों की संख्या बढ़कर 123 हो गई थी, जिसमें 4185 विद्यार्थी तथा 242 शिक्षक थे।
  • सन् 1914 ईस्वी में मिस हिव्फम द्वारा चुटिया बालक विद्यालय का शुभारंभ किया गया।
  • 1918 ईस्वी में 157 विद्यालय थे जिनके अंतर्गत लगभग 5537 विद्यार्थी तथा 294 शिक्षक थे।
  • सन् 1919 ईस्वी में सेंट मार्गरेट बालिका उच्च विद्यालय (Saint Margaret’s Girl’s High School ) को स्वीकृति दे दी गई। तथा ईसाई मिशनरियों के द्वारा 1934 ईस्वी में इस विद्यालय के लिए एक छात्रावास (Hostel) भी बनाया गया। 1942 ईस्वी में इस विद्यालय के अंतर्गत 546 छात्राएं थी जो 1973 में बढ़कर 700 हो गई थी।

रोमन कैथोलिक मिशन (Roman Catholic Mission) द्वारा झारखण्ड में किये गए कार्य

1892 ईस्वी में फादर जे.बी. हॉफमैन ने खपरैल उद्योग संबंधित एक विद्यालय प्रारंभ की, इस विद्यालय में उत्पादित कपड़े इतने अच्छे किस्म के होते थे कि रोमन मिशन खपरैल के रूप में यह प्रसिद्ध हो गए। परंतु प्रथम विश्व युद्ध के प्रारंभ में होते ही यह विद्यालय बंद हो चुकी थी।

23 नवंबर सन् 1885 को रोमन कैथोलिक मिशन का फादर कांस्टेंट लिवेंस नामक एक धर्म प्रचारक छोटा नागपुर आया जिसकी नीति छोटानागपुर से निरक्षरता दूर करनी थी। सन् 1886 ईसवी तक इस मिशन द्वारा 30 विद्यालय चलाए जा रहे थे, जिसकी संख्या बढ़कर सन् 1888 तक 77 हो गई। जिनमें 2400 बच्चों को एडमिशन लिया गया था, 25 मार्च सन् 1887 ईस्वी को सेंट जॉन विद्यालय की आधारशिला रखी गई थी। इसके पहले फादर स्टिकमैन बुरुडीह में एक बालिका विद्यालय की स्थापना कर चुके थे। बेल्जियम से चार लारेटो बहनों का एक दल 21 मार्च सन्न 1890 ईस्वी को रांची पहुंचा जिसने 1 वर्ष के अंदर एक बालिका विद्यालय की स्थापना की।

सन् 1893 में फादर जॉन बैपटिस्ट हाफमैन छोटानागपुर में आदिवासियों के बीच कैथोलिक धर्म का प्रचार करने के उद्देश्य से आए थे।सबसे पहले उन्होंने बनगांव अपना धर्म प्रचार केंद्र चुना, परंतु कुछ वर्षों के बाद उन्होंने रांची को अपना मुख्यालय बनाया जहां वे 1915 ईस्वी तक रहे। 1895 ईस्वी में ही उन्होंने पूरे छोटानागपुर के लिए एक केंद्रीय मध्य विद्यालय रांची में शुरू की। शुरू में यह एक रोमन कैथोलिक मध्य विद्यालय था लेकिन सन् 1896 ईसवी में गैर – ईसाई लड़कों का भी दिवा छात्र के रूप में नामांकन किया जाने लगा। 1905 ईस्वी में इसको विद्यालय उच्च विद्यालय में परिवर्तित कर दिया गया जिसे 1980 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध (affiliated) कर दिया गया। 

इसके छात्रावास (Hostel) में रहने वाले छात्रों को ज्यादा Fee नहीं देनी पड़ती थी, रोमन कैथोलिक मिशन ने एक योजना बनाई जिसके अंतर्गत प्रत्येक मिशन स्टेशन में एक उच्च प्राथमिक विद्यालय तथा एक मध्य विद्यालय खोलने का निर्णय लिया गया। 1912 ईस्वी के अंत तक बालकों के लिए 140 विद्यालय कैथोलिक मिशन द्वारा चलाए जा रहे थे। जिसमें करीब 7683 विद्यार्थियों का नामांकन किया गया था, 1914 ईस्वी तक रोमन कैथोलिक मिशन के द्वारा एक उच्च विद्यालय लड़कों के लिए, चार मध्य विद्यालय लड़कियों के लिए तथा अनेक ग्रामीण विद्यालय चलाए शुरू किये जा चुके थे।

1903 ईस्वी में फादर ग्रोस जॉन से सेंट जॉन मध्य विद्यालय के निकट 9 विद्यार्थियों के साथ एक ऐपटॉलिक विद्यालय प्रारंभ किया गया। 1916 ईस्वी में यहां विद्यार्थियों की संख्या बढ़कर 27 हो गई यहां इसाई मुंडा तथा उरांव लड़कों के लिए तर्कशास्त्र, गणित, इतिहास, भूगोल, भाषण, संगीत और व्यायाम के 6 वर्षीय पाठ्यक्रम का प्रावधान शुरू किया था।

1905 ईसवी में कैथोलिक मिशन ने रांची में एक लैस विद्यालय प्रारंभ किया, जिसमें 100 से अधिक महिलाएं जाने लगी। तथा फीता बनाने की कला सीखने लगी स्थानीय मुंडा तथा उरांव महिलाओं द्वारा बनाए गए फीतो को कोलकाता तथा इंग्लैंड के बाजारों में भी काफी डिमांड होने लगी थी। 

सिंधी काका सेंट मैरी विद्यालय दूसरा रोमन कैथोलिक विद्यालय था, जो 1920 ईस्वी में उच्च विद्यालय में परिवर्तित कर दिया गया। 1936 ईस्वी में सेंट एग्सिअस ने गुमला में उच्च विद्यालय आधारशिला रखी। 1930 ईसवी के अंत तक रोमन कैथोलिक मिशन द्वारा संचालित 5 उच्च विद्यालय थे जिनमें करीब 1078 छात्र थे और 3 बालिका विद्यालय है जिसके अंतर्गत 868 छात्राएं अध्ययन कर रही थी। इन सभी विद्यालयों में उरांव जनजाति की संख्या सबसे अधिक थी और उन्हें ही शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षाकृत ज्यादा उपलब्धियां प्राप्त हो रही थी।

1928 से 1947 ईस्वी तक अनेक प्राथमिक विद्यालय को मध्य विद्यालय में परिवर्तित कियाजा चुका था, कुल विद्यालयो की संख्या 697 थी। जिसमें लगभग 12007 लड़के तथा 3884 लड़कियां पढ़ा करते थे, इन सभी विद्यालयों की व्यवस्था करने में रोमन कैथोलिक मिशन को समस्या हो रही थी। जब द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ तो अनेक विद्यालयों का विनाश हो गया, 1940 ईस्वी तक कुल विद्यालय की संख्या घटकर 600 हो गई थी।

7 जुलाई सन् 1944 को 130 विद्यार्थियों के साथ सेंट जेवियर कॉलेज रांची (St. Xavier’s College Ranchi) की स्थापना की गई जिसमे इंटरमीडिएट की पढाई शुरू की गई। यहां कला तथा विज्ञान की कक्षा दिन में तथा वाणिज्य (Commercial) की कक्षा शाम में ली जा रही थी। सन् 1948 ईस्वी में इस कॉलेज में स्नातक(graduate) (कला) स्तर की पढ़ाई शुरी कर दी गई थी। धीरे – धीरे हिंदी, अंग्रेजी गणित, भौतिकी तथा रसायन शास्त्र में प्रतिष्ठा स्तर की पढ़ाई शुरू कर दी गई। test result (परीक्षाफल) तथा छात्रों के बीच अनुशासन के कारण इसे राज्य विश्वविद्यालय का सबसे अच्छा कॉलेज माना जाने लगा था।

तथा इसकी गणना बिहार के सबसे अच्छे कॉलेजों में की जाने लगी थी, 1970 में यहां लगभग 2500 विद्यार्थी इस कॉलेज में अध्ययन कर रहे थे।

कैथोलिक मिशन केवल सामान्य शिक्षा का प्रसार कर ही संतुष्ट नहीं हुआ बल्कि इसने एकाधिक व्यवसायिक प्रशिक्षण संस्थाओं (Multiple Vocational Training Institutions) की स्थापना की। सन् 1921 ईस्वी में खटकरी तथा 1923 ईस्वी में मांडर में बढईगिरी प्रशिक्षण विद्यालय (carpentry training school) प्रारंभ किया गया। 1947 के अंत तक लड़कों तथा लड़कियों के लिए 3 – 3 प्रशिक्षण विद्यालय चलाए जा रहे थे। जिनके अंतर्गत क्रमश: 88 तथा 64  विद्यार्थी थे । 1971 ईस्वी में कैथोलिक मिशन ने लोहरदगा में उर्सुलिन शिक्षण प्रशिक्षण महाविद्यालय का शुभारंभ किया गया।

अन्य ईसाई मिशनरियों (Other Mission) का झारखण्ड में क्या योगदान रहा?

जी. ई. एल. मिशन एस. पी. जी. मिशन तथा रोमन कैथोलिक मिशन के अलावा अन्य मिशनरियों ने झारखंड के आदिवासियों के बीच शिक्षा का प्रसार करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जिनमें स्कॉटलैंड यूनाइटेड फ्री चर्च सेवेंथ डे एड्वेंटिस्ट का नाम उल्लेखनीय है। डूबलीन यूनिवर्सिटी मिशन ने जुलाई सन् 1889 ईस्वी में हजारीबाग में सेंट कोलंबस कॉलेज की स्थापना की। यह पहला मिशन था जिसने छोटानागपुर में 1 डिग्री कॉलेज की स्थापना की। इससे पहले इस मिशन ने अप्रैल सन् 1895 ईस्वी में सेंट कोलंबस कॉलेजीएट उच्च विद्यालय (St. Columbus Collegiate High School) की स्थापना की।

  • वर्मा (1995) ने सेंट एनी बहुद्देशीय प्रशिक्षण केंद्र रांची (St. Anne’s Multipurpose Training Center Ranchi)
  • गृहिणी स्कूल ऑफ कैथोलिक चैरिटीज रांची (Housewives School of Catholic Charities Ranchi)
  • सेंट माइकल स्कूल फॉर द ब्लाइंड रांची ( St. Michael’s School for the Blind Ranchi)
  • सेंट पॉल ट्रेनिंग सेंटर टोंगो गुमला (St. Paul’s Training Center Tongo Gumla)
  • यंग मैन क्रिश्चियन एसोसिएशन वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर रांची (Young Man Christian Association Vocational Training Center Ranchi)
  • डॉन बास्को इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग सेंटर रांची (Don Basco Industrial Training Center Ranchi) के अध्ययन के संदर्भ (reference) में पाया कि ईसाई मिशनरियों से संबंध में गैर सरकारी संस्थाएं बिहार सरकार से जनजातियो के कल्यानार्थ अनुदान राशि (grant money for welfare) प्राप्त कर व्यवसायिक प्रशिक्षण (सिलाई, कढ़ाई, पेंटिंग टंकण, आशुलिपि इत्यादि), बालवाड़ी केंद्रों का संचालन, नेत्रहीन छात्रों की शिक्षा व व्यवसायिक प्रशिक्षण इत्यादि  कार्यक्रम चला रही थी।

तो झारखण्ड में ईसाई मिशनरियों का स्कूल खोलने और झारखण्ड के युवा को शिक्षित करने में बड़ा योगदान रहा है। छोटानागपुर तथा संथाल परगना के पिछड़े क्षेत्रों में भी ईसाई मिशनरियों ने शिक्षा का प्रसार किया। इस शिक्षा ने झारखंड के आदिवासियों को साक्षर ही नहीं बनाया, बल्कि यह उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में काफी मददगार साबित हुई। ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रदत शिक्षा (imparted education) ने उन्हें सरकारी नौकरीयो तथा अन्यत्र आजीविका तलाशने में सार्थक भूमिका निभाई। ईसाई मिशनरियों ने हर जगह शिक्षा को बढ़ाने काम किया, आज झारखण्ड के हर जिले में कहीं न कहीं ईसाई मिशनरियों द्वारा स्थापित स्कूल मिल जाएगी।

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