बिरसा आंदोलन कब शुरू हुआ, बिरसा उलगुलान आंदोलन कब हुआ था? : Birsa Andolan in hindi

बिरसा आन्दोलन का क्या कारण था? 1899 में उलगुलान की शुरूआत कैसे हुई?

  • बिरसा उलगुलान आंदोलन एक संक्षिप्त टिप्पणी।
  • बिरसा आंदोलन से आप क्या समझते हैं?
  • बिरसा आंदोलन का क्या महत्व था?
  • बिरसा आंदोलन पर प्रकाश डालें।
  • मुंडा विद्रोह के कारण और परिणाम।
  • मुंडा विद्रोह कहां हुआ था?


बिरसा उलगुलान के कारण स्वरूप एवं परिणामों की विवेचना करें।

बिरसा आंदोलन क्या था?

मुंडा जाति और आदिवासी जाति अपनी जमीन, संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए 19वीं शताब्दी के अंत में बिरसा मुंडा जी के नेतृत्व में छोटानागपुर क्षेत्र मके जनजाति लोगों ने जो आंदोलन शुरु किया था उसे बिरसा आंदोलन नाम दिया, उसे बिरसा आंदोलन कहा जाता है। जनजातीय भूमि व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो रही थी और बाहर से आकर बसने वाले लोगों की स्थिति यहां पर पहले से रह रहे आदिवासी लोगो से बहुत अच्छी थी। गांव में शांति तथा एकता की भावना मानो गायब होती जा रही थी। गांव परिवार तथा मुंडा जाति के नैतिक मूल्यों का प्रारंभ हो चुका था। उनके सांस्कृतिक केंद्र परहा, पंचायत अखरा गतिओरा, धूमकुरिया कमजोर पड़ते जा रहे थे इसी पृष्ठभूमि में बिरसा आंदोलन शुरू हुआ।

बिरसा आंदोलन के क्या क्या कारण है –

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19वीं शताब्दी के अंत में छोटानागपुर के एक छोटे से पहाड़ी क्षेत्र में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए आंदोलन को बिरसा आंदोलन कहा जाता है। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य धार्मिक सुधार, सामाजिक शुद्धीकरण एवं उंडा समाज को आर्थिक शोषण से मुक्त कराना था। इस आंदोलन का स्वरूप अंत में पूर्णरूप से राजनीतिक रूप ले लिया इसका उद्देश्य मुंडा राज की स्थापना करना था।

बिरसा आंदोलन के कारणों के 4 भागों में बांटा जा सकता है –

  • आर्थिक कारण
  • सामाजिक कारण
  • जनजातीय आंदोलन
  • ईसाई मिशनरियों का प्रभाव

1.आर्थिक कारण – अंग्रेजी शासन के पहले से ही जनजातीय भूमि व्यवस्था के स्वरूप में परिवर्तन आने लगा था छोटानागपुर के राजा अपने संबंधियों को खोरपोश दिया करते थे। जिससे मुंडाओ की भूमि व्यवस्था प्रभावित हुई जज थी। 19वीं शताब्दी तक स्थिति अत्यंत गंभीर बन चुकी थी, जनजातीय क्षेत्रों में बाहरी लोगों का एक नया खेमा उभर रहा था। इस नए खेमे में जागीरदार, जमीदार थे जिन्हें उनकी असैनिक, सैनिक या धार्मिक सेवाओं के पुरस्कार स्वरूप गांवों के पट्टे दिए जाते थे। इसके अलावा इस नए खेमें में ठेकेदारों को भी एक बड़ी संख्या सम्मिलित थी। जो दूसरों को लूटने खसोटने में माहिर और उस्ताद होते थे।

सन् 1856 ईस्वी तक जागीरदारों की संख्या लगभग 600 हो चुकी थी, सन् 1874 ईसवी तक पुराने मुंडा तथा उरांव सरदारों का प्रभाव धूमिल हो चुका था। उनका स्थान अब गैर आदिवासी किसान ले चुके थे, वे जोर जबरदस्ती से या अदालतों का निर्णय अपने पक्ष में करवा कर आदिवासियों पर भूमि हथियाने में, जमीन पर मालगुजारी लाद देने, रैयतों के साथ भूमि संबंधी शर्तें कड़ी कर देने में कुशल थे। अतः अधिकांश जनजातीय किसान अब कृषक श्रमिक हो गए थे।

ब्रिटिश शासकों ने जमीन दारी व्यवस्था प्रारंभ की थी ब्रिटिश अदालत हो तथा खर्चीली न्याय व्यवस्था ने भी प्राचीन जनजातीय भूमि व्यवस्था को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई इन सब कारणों के फल स्वरुप मुंडा सरकार विरोधी होने लगे। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आर्थिक दबाव के कारण मुंडा लोग असम तथा आसपास के चाय बागानों में तथा खुली के रूप में अन्य यंत्र कार्य करने लगे सन 18 से 64 ईसवी से 867 ईसवी तक 4 वर्षों के दौरान बाहर जाने वाले मुंडा एवं अन्य जनजातियों की संख्या 12367 थी चाय बागानों में कुली के रूप में कार्यरत जनजातियों की संख्या 6590 थी जिनमें 3986 मुंडा 1058 उरांव तथा 1586 भूमिया जाति के लोग थे।

2.सामाजिक कारण – नहीं व्यवस्था ने मुंडा समाज में पहन के महत्व को कम कर दिया पुराने मुंडा समाज में मुंडा की स्थिति पहन के प्रमुख सहायक के रूप में थी किंतु अब मुंडा को गांव का नेता समझा जाने लगा। अतः मुंडा तोता पहन के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई जागीरदार व्यापारी राजस्व तथा ने आले के कर्मचारी पुलिस अफसर मिशन के प्रचारक आधी मुंडा को ही अत्यधिक प्रदान करने लगे अतः पहन का स्थान गांव में मात्र पुरोहित के रूप में सिमट कर रह गया।

मुंडा ओके परंपरागत तरह तथा ग्राम पंचायतें भी तेजी से निष्क्रिय होते गए सामाजिक विभाग अब परंपरागत पंचायतों के बजाय अंग्रेजों अंग्रेजी शासन तथा उसकी अदालतों द्वारा सुलझाए जाने लगे इस परिवर्तन का मुंडा जनजाति के नैतिक मूल्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा कुछ मुंडा धोखेबाजी तथा भ्रष्टाचार पर उतर गए शराब खोरी की समस्या बहुत पहले से ही मुंडा समाज की एक गंभीर समस्या थी जिसके फलस्वरूप समाज में बहुत अधिक नैतिक पतन हुआ बिरसा आंदोलन का उद्देश्य मुंडा समाज के व्याप्त सामाजिक बुराइयों को भी दूर करने का प्रयास शामिल था।

3.ईसाई मिशनरियों का प्रभाव – मुंडा तथा अन्य जनजातियों पर ईसाई धर्म का व्यापक प्रभाव पड़ा, छोटा नागपुर के जनजातीय क्षेत्र में ईसाई धर्म के प्रचार के लिए सबसे पहले गोस्नर ईवेजेलिकल लूथर कमीशन ने कदम उठाया था। सन 1860 ईस्वी तक ईसाई धर्म अपनाने वाले जनजातियों की संख्या 1227 तथा सन् 1868 ईसवी में 12108 हो गई। मुंडा क्षेत्र में कई मिशन केंद्र की स्थापना हुई सन् 1869 ईस्वी में बुरूजू, सन् 1870 ईस्वी में गोविंदपुर तथा सन् 1901 ईस्वी में अमलेशा में ईसाई मिशन केंद्र की स्थापना हुई। मुन्ना क्षेत्र के आसपास सबसे पहले सन् 1865 ईस्वी में चाईबासा में मिशन बना। सन् 1873 ईस्वी में टकरना में, सन् 1892 ईस्वी में लोहरदगा तथा चैनपुर में, सन् 1893 ईस्वी में चक्रधरपुर तथा सन् 1895 ईस्वी में खूंटी में मिशन केंद्र स्थापित किया गया।

सन् 1895 ईस्वी में तक छोटानागपुर में 13 मिशन स्थापित किए जा चुके थे तथा मुंडा उरांव एवं अन्य जनजातियों के 45000 व्यक्ति ईसाई धर्म अपना चुके थे।

ईसाई धर्म में ईसाई जनजातियों के बौद्धिक पक्ष को विकसित कर उन्हें अपने अधिकार तथा कर्तव्य से अवगत कराया। भूमि हस्तांतरण की समस्याओं को हल करने में ईसाई मिशनरियां जनजातियों को सहयोग दे दिया करती थी। परंतु वे मुंडा जनजातियों पर परंपरागत नैतिकता से मेल न खाने वाले कुछ रस्मो रिवाज को भी बलपूर्वक थोपा करते थे। ईसाई धर्म के बढ़ते प्रभाव के कारण परहा, पंचायत, गितिओरा जैसी सामाजिक एवं राजनीतिक संस्थाएं टूटने लगी थी।

4.जनजातीय आंदोलन – सन 1831-32 ईस्वी में कोल विद्रोह हुआ फिर दालभूमि तथा मानभूमि में भूमिज विद्रोह हुआ। सरदार आंदोलन लगभग 40 वर्षों तक चला इन सभी आंदोलनों ने बिरसा आंदोलन के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी।

बिरसा आंदोलन का क्या कया प्रभाव थे-

1.भूमि बंदोबस्ती (Land Settlement) – बिरसा आंदोलन ने यह प्रमाणित कर दिया कि जब तक मुंडाओं की भूंइहरी एवं खूंटकट्टी जमीन की सुरक्षा नहीं की जाएगी, उन्हें शांति नहीं मिल सकेगी। अतः रेवरेंड होफमैन एवं कमिश्नर और फोरबेस के अनुरोध पर खूंटी, धमाड़, बुंडू और सोनाहातू जैसे मुंडा क्षेत्रों में जहां सन् 1969 ईस्वी में सर्वे नहीं हो सका था, सर्वे प्रारंभ किया गया इससे लोगों को राहत मिली।

फरवरी सन् 1904 ईस्वी में लेफ्टिनेंट गवर्नर रांची आए तो जनता के विभिन्न वर्गों ने भूमि बंदोबस्ती कार्य का विस्तार अन्य क्षेत्रों में भी करने का निवेदन किया जिसे स्वीकार कर लिया गया। भूमि बंदोबस्ती कार्यक्रम के फलस्वरुप उनके बीच बहुप्रतीक्षित शांति तथा सुरक्षा का माहौल उत्पन्न हुआ। ऋण दिए जाने की जो नई व्यवस्था की गई उससे मुंडा किसान अब कुछ हद तक सुदखोरों के चंगुल से बच गए। अब दीवानी तथा फौजदारी मुकदमों की संख्या में कमी आने लगी थी, लगानों मुकदमे अब प्रायः एक ही सुनवाई में आसानी से निपटाए जाने लगे थे।

2. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम – छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम सन 1960 ईस्वी द्वारा एक शताब्दी से चली आ रही भूमि उपद्रव का सिलसिला खत्म हो गया भूमि असंतोष को समाप्त करने के लिए समय-समय पर प्रशासनिक तथा कानूनी उपाय किए थे उन सभी का समावेश इस अधिनियम के तहत किया गया। सन 18 सो 79 ईस्वी का छोटा नागपुर जमीदार तथा रजत करवाई अधिनियम तथा संगठन से कानूनी का लगान रूपांतरण अधिनियम के अंतर्गत खूंटकट्टी दार तथा मुंडा कोटेदार का कोई कानूनी परिभाषा दी गई। इस कानून के तहत गांवों की सीमाओं के अंतर्गत भूमि चुकी ग्राम परिवार समुदाय की सामान्य संपत्ति है और क्योंकि यह परिवार उन गांव के मूल संस्थापक प्रत्यक्ष पुत्र अधिकारी हैं

इसलिए उनमें से किसी परिवार से उसका भूमि अधिकार नाचने का प्रावधान रखा गया डिप्टी कमिश्नर को उसके लिए शक्ति प्रदान की गई कि खूंटकट्टी गांव में यदि किसी भारी आदमी ने जबरन या अपने किसी अन्य प्रभाव के चलते कोई जमीन हड़प रखी है तो उसे पहले बाहर किया जाए इस कानून के अंतर्गत गांव की जमीन की बिक्री, उसके स्वामित्व के अंतरण पर रोक लगा दी गई थी।

तथा लगाने के लिए रसीद देने तथा लगान को किसी अन्य रूप में देने की व्यवस्था आदि का प्रावधान रखा गया इस कानून के बनने से कुछ वर्षों के लिए भूमि समस्या उग्र नहीं रह गई तथा गांव का वातावरण अपेक्षाकृत शांत हो गया।

3. प्रशासनिक पुनर्गठन (administrative reorganization) : बिरसा आंदोलन का ही प्रभाव था कि सन् 1902 ईस्वी में गुमला, 1 दिसंबर सन् 1905 ईस्वी को खूंटी और सन् 1910 ईस्वी में सिमडेगा को सबडिवीजन बनाया गया। कानूनी राहत के लिए अब रांची आने से छुट्टी मिली प्रशासन को भी इससे बल मिला।

4. धार्मिक तथा राजनीतिक जागृति – इस आंदोलन से छोटानागपुर के आदिवासियों में धार्मिक तथा राजनीतिक जागृति का विकास हुआ। बिरसा को जन आकांक्षाओं को स्वर देने वाले प्रतिनिधि के रूप में माना जाने लगा। बिरसा आंदोलन के बाद बिहार के जनजातीय प्रदेश में जितने भी सामाजिक धार्मिक आंदोलन पनपे उन पर किसी ना किसी सीमा तक इस आंदोलन का प्रभाव अवश्य था। बिरसा आंदोलन की भांति इस आंदोलन में भी शुद्धीकरण समारोह, प्रार्थना में विश्वास तथा जादू टोना, दुष्ट आत्माओं तथा बलिदान पर प्रहार किया गया। बिरसा आंदोलन के बाद के आंदोलन में भी इस भूमि समस्या की भावना बरकरार रही तथा अंग्रेजों व दिकुओं के प्रति विरोध उभर के सामने आई।

5.परवर्ती जनजातीय आंदोलनों पर प्रभाव – बिरसा आंदोलन का प्रभाव अन्य परवर्ती जनजातीय आंदोलनों पर भी पड़ा, छोटानागपुर की उरांव जनजाति के बीच हुए टाना भगतों का आंदोलन पर भी बिरसा का प्रभाव परिलक्षित होता है। टाना भगत मांस भक्षण नहीं करते थे। यक्षोपवीत पहनते और बिरसा के जन्मदिन बृहस्पतिवार को विश्राम दिवस के रुप में मनाया करते थे। इनकी प्रार्थनाएं एवं प्रार्थना करने का ढंग भी बिरसा धर्मावलंबियों के सदृश थे। टाना भगत एवं अन्य धार्मिक सामाजिक आंदोलनों ने सन् 1921-1922 के दौरान भूत-प्रेतों पर हमला किया। खानपान में शुद्धता बरतने पर जोर दिया तथा भूमि समस्या पर बल दिया तथा उरांव दोनों ही थे स्पष्ट प्रभाव था।

निष्कर्ष – क्षेत्रीय आधार पर सामाजिक परिवर्तन के प्रतीक के रूप में बिरसा और उनके आंदोलन का काफी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। झारखंड के जनजातीय क्षेत्र में अंग्रेजी शासन की स्थापना तथा सुदृढ़ीकरण के फलस्वरुप जनजातीय व्यवस्था को काफी आघात पहुंचा था। बिरसा आंदोलन की जड़े जनजातीय अर्थव्यवस्था के विघटन तथा उनके सामाजिक सांस्कृतिक जीवन के इसी बिखराव में निहित थी। बिरसा ने इस आंदोलन के क्रम में मुंडाओं की भूमि समस्या पर बल दिया तथा अपने लोगों की समस्याओं के निदान के लिए एक न‌ए राजा के अधीन बिरसा राज्य की स्थापना पर जोर दिया।

यद्यपि आंदोलन एक स्थानीय घटक थी किंतु इस आंदोलन का उद्देश्य जनजातीय जीवन का संपूर्ण पूर्णगठन था। बिरसा आंदोलन ने अपने क्षेत्र की भूमि व्यवस्था के बिखराव को रोका, कुछ खूंटकट्टी गांवों को बचाने में कामयाबी भी पाई। तथा प्रशासन के लिए अधिक सुविधाजनक इकाइयों के सृजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, किंतु तत्कालिक सुधार के उपाय अपना स्थायी प्रभाव ना छोड़ो सके।

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