Palamu district ka Itihas | पलामू का इतिहास | पलामू पर चेरोवंश का शासन काल दौर का इतिहास | Arts Semester 3 झारखण्ड का इतिहास

पलामू (Palamu) के चेरो राज परिवार की उत्पत्ति एवं इतिहास

पलामू का इतिहास palamu ke purane kile ka photo

आज बात करेंगे पलामू (Palamu) के इतिहास के बारे में जब मुग़ल काल की शुरुआत हुई थी तब झारखण्ड में छोटे बड़े राज्यों की संख्या अनगिनत थी, ऐसी स्थिति लगभग सभी विभाजित और अविभाजित राज्यों की थी। तो झारखण्ड का जिला पलामू भी में से एक था, पलामू राज्य जो की अभी यानि वर्तमान में झारखण्ड का एक जिला है, उस वक्त पलामू पर शासक चेरोवंश का शासन चल रहा था लेकिन शुरुआत में पलामू पर रेकसेल का कब्ज़ा था। 

palamu ke purane kile ka photo
पलामू के पुराने किले

पलामू (Palamu) के चेरोवंश की स्थापना किसने की, पलामू के संस्थापक कौन है?

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कुछ इतिहासकारो का कहना है की भागवत राय ने रेकसेल राजा मान सिंह के पुरे परिवार के लोगो को मारकर राज्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और Palamu पर अपनी चेरोवंश की स्थापना कर दी थी। और ये वही वक्त था जब सन् 1613 ईस्वी के आसपास उतर प्रदेश के आगरा जिले में जहाँगीर का शासन चल रहा था, और इसी वक्त पलामू में चेरो राजवंश की स्थापना हुई थी। लेकिन अभी के कुछ शोधकर्ताओ का कहना है कि शेर खां की गद्दी पर बैठने से पूर्व ही चेरो राजवंश रोहतास से चलकर पलामू में बस चुके थे। 

सन् 1639 ईस्वी में हुमायूँ और शेरशाह के बीच चौसा के युद्ध से ठीक पहले शेर खां ने अपने सेनापति खबास खां को सेना के साथ झारखण्ड के राजा महारथ चेरो से युद्ध के लिए भेजा। खमास खां द्वारा सन् 1538 ईस्वी में महारथ चेरो को पराजित करने के बावजूद भी सुर और चेरो के बीच संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ, ये आगे भी चलता रहा। 

जब अकबर का शासन था तब झारखण्ड में उसका असर –

महारथ चेरो के विरुद्ध शेरशाह की सफलता का चेरो पर किसी भी तरह का असर नहीं हुआ, तो सन् 1539 ईस्वी में राजा मानसिंह ने चेरो राज्य पर आक्रमण कर दिया। यह अभियान चेरो के राजा भागवत राय के विरुद्ध चलाया जा रहा था, भागवत राय को पलामू का राजा बना छोड़ दिया गया, और वहीं एक शाही फ़ौज निगरानी के लिए छोड़ गया। सन् 1605 इस्वी में अकबर के निधन के बाद उन्होंने मुग़ल फ़ौज को पलामू से खदेड़ दिया और फिर से अपनी सत्ता स्थापित कर लिया। 

जहाँगीर के समय झारखण्ड में कैसा असर था?  – 

जहाँगीर के शासनकाल में मुग़ल झारखण्ड संबंधो के इतिहास के एक नए युग का आरंभ हुआ खासकर के मुग़ल के चेरो संबंध के सन्दर्भ (Context) में। जहाँगीर के शासन काल में पलामू पर दो चेरो राजाओ ने शासन किया, भागवत राय के निधन के बाद अनन्त राय पलामू के राजा बने, अनन्त राय पलामू पर करीब सन् 1631 से सन् 1661 तक ( करीब 31 वर्ष ) शासन किया। जहाँगीर के शासन काल में एक और चेरो राजा सह्बल राय थे, लेकिन इसका जिक्र किसी भी ग्रन्थ में नहीं मिलता। लघभग सन् 1612 ईस्वी में अनन्त राय के निधन के बाद सहबाल राय राजा बने, ये बहुत ही शक्तिशाली राजाओ में से एक थे।

सहबाल राय जिसने जी टी रोड (सड़के आजम) पर चौपारण तक अपना शासन स्थापित किया और एक अपना बड़ा क्षेत्र बनाया। राजा सहबाल राय मुग़ल कालीनो को लूटता था और बंगाल का जो आने जाने का रास्ता था उसे बंद कर देता था। इस रवैये से क्रोधित होकर जहाँगीर ने अपने सैनिको के जरिये बलपूर्वक उसे हरा कर उसे बंदी बनाकर जहाँगीर के पास दिल्ली ले आया गया। 

चेरो में प्रचलित एक कहानी के अनुसार जहाँगीर सह्बल के शरीर शौष्टव (धार्मिक) से प्रभावित होकर उसे एक बाघ से निहत्थे यानि बगैर किसी हथियार के ही लड़ने के लिए खुले मैदान में छोड़ दिया, स्वभाकिक है कि बगैर हथियार के कोई भी असाधारण व्यक्ति बाघ से लड़ना तो दूर लड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता था और अन्त में सह्बल की इस लड़ाई में मृत्यु हो गई। सह्बल के मृत्यु के बाद चेरो ने सीमावर्ती मुग़ल प्रदेशो को लूटना शुरू कर दिया और उन्होंने शाही खजाना ले जाने वाली एक नाव को सोन नदी में लूट लिया।

परिणामस्वरूप पलामू में पुन: मुग़ल का शासन शुरू हो गया और चेरो राजा को पलामू छोड़ कर अपनी जान बचा कर भागना पड़ा। 

शाहजहाँ का झारखण्ड पर प्रभाव :- 

शाहजहाँ के शासनकाल में मुग़ल और चेरो का संबंध प्रत्यक्ष रूप से उभर कर सामने आने अलग और इनके बीच हुई घटना सबसे ऊपर रहती थी। और उसी वक्त से पलामू का इतिहास एक क्रमबद्ध और बहुत से प्रमाणिक तथ्य भी मौजूद है। सह्बल राय के पश्चात् प्रताप राय के शासनकाल में पलामू पर मुगलों ने कई बार आक्रमण किया, प्रताप राय एक शक्तिशाली राजा थे और उसके शासनकाल में पलामू अत्यंत सुख समृधि से भर गया था।

और उसी के शासनकाल में पलामू के पुराने किले का निर्माण हुआ था, जिससे ऐसा प्रतीत होता है की प्रताप राय के शासनकाल के प्रारंभ से ही मुग़ल और चेरो का संबध बेहद ही ख़राब था। देखा जाये तो सबसे ज्यादा किले इसी के शासनकाल के दौरान बनाया गया था, प्रताप राय ने बिहार के सूबेदार को सालाना कर देना बंद कर दिया था, और शाहजहाँ के आदेश पर बिहार के सूबेदार शाइस्ता खां से सन् 1642 ईस्वी में पलामू पर हमला करवा दिया गया जिससे चेरो सेनाओं को काफी क्षति हुई।

और अंत में प्रताप राय ने शाइस्ता खां को संधि के लिए एक पत्र भेजा जिसमे 30 हजार रुपये सालाना कर के रूप में प्रताप राय ने शाइस्ता खां को देना स्वीकार किया।और अग्रीमेंट के हिसाब से रकम मिल जाने के बाद शाइस्ता खां वापस लौट गए।

शाहजहाँ के समय पलामू के चेरो राज्य पर दूसरा हमला सन् 1643 ईस्वी में हुआ जब प्रताप राय ने मुगलों को सालाना कर यानि टैक्स देना बंद कर दिया था। मुग़ल के सेनापति जबरदस्त खां ने सन् 1643 ईस्वी में पलामू पर हमला कर देवगण किले पर कब्ज़ा कर लिया, बहुत लम्बे समय के संघर्ष के बाद जबरदस्त खां और प्रताप राय के बीच संधि (समझौता) हुई। इसके बाद प्रताप राय सन् 1693 ईस्वी तक मुगलों के वफादार बना रहा। चेरो के परम्परागत वंसज के अनुसार सन् 1662 से सन् 1674 ईस्वी तक पलामू का राजा भूपाल राय था। भूपाल राय अधिक दिनों तक शासन नहीं कर पाए मात्र कुछ महीने ही शासन कर पाए। 

मेदिनी राय का शासन शाहजहाँ के शासनकाल के अंतिम के वर्षो में शुरू हुआ था।

औरंगजेब शासनकल में झारखण्ड पर असर

औरंगजेब के शासन के शुरुआती वर्षो में पलामू का चेरो राजा मेदिनी राय था, जिसने सन् 1658 ईस्वी से 1673 ईस्वी तक शासन किया। मेदिनी राय एक शक्तिशाली और प्रतापी राजा हुआ करते थे जिसने गद्दी पर बैठते ही मुगलों के अधीन रहने से सीधा इंकार कर दिया था। दिनी राय न केवल कर देना बंद कर दिया था साथ में अगल बगल के जितने भी सीमावर्ती मुग़ल प्रदेश को उजाड़ना भी शुरू कर दिया था। अपने पड़ोसियों राजाओं से भी अकसर लड़ाईयां होती रहती थी। उसने नागवंशी राजाओ की नयी राजधानी दोइशा पर हमला किया और लूटा भी और साथ में वहां के एक पत्थर का प्रसिद्ध फाटक भी ले आया।

जो आज नागपुर द्वार के नाम से पलामू के नए किले की सोभा है। मेदिनी राय ने ही पलामू के नए किले का निर्माण पुराने किले के निकट के एक किले पर करवाया था और इसी समय नागपुर फाटक को लगाया गया था। औरंगजेब ने बिहार के सूबेदार पलामू पर आक्रमण कर चेरो राजा से सालाना कर वसूलने का आदेश दिया।

दाउद खां निर्विरोध पलामू में प्रविष्ट हुआ और कोठी के किले और कुंडा के किले पर अपना अधिकार जमा लिया। कुंडा के शासक चुना राय इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था और उसे शाही सनद (अधिपत्र) द्वारा सम्मिलित कर लिया गया। किन्तु उसके धर्म परिवर्तन को चेरो बर्दाश्त नहीं कर पाए और मेदिनी राय के इशारे पर चुनी राय के भाई सुखार राय ने उसकी हत्या कर दी। इसी बीच मेदिनी राय की पेशकश की रकम को ठुकराते हुए दाउद खां ने अपने सेना के साथ चेरो की राजधानी को ओर बढ़ गया।

औरंगजेब के आदेशनुसार दाउद खां ने मेदिनी राय के समक्ष इस्लाम धर्म स्वीकार करने और पेशकश की रकम देने का प्रस्ताव रखा। पलामू के बहादुर राजा मेदिनी राय ने औरंगजेब की इस प्रस्ताव को ठोकर मारते हुए अंतिम क्षण तक युद्ध लड़ने का संकल्प किया। लम्बे और कड़े संघर्ष के बाद चेरो पराजित हुआ, उन्हें जन धन की बहुत क्षति उठानी पड़ी। उनके किलो पर मुगलों का अधिकार हो गया और मेदिनी राय को अनंता सुरगुजा में शरण लेनी पड़ी। परन्तु बाद में वहां के सूबेदार मनकली खां के हटते ही उसने अपने खोये हुए राज्य पर पुन: अधिकार कर लिया। 

मेदिनी राय को न्यासी (trustee) राजा कहा गया है, उसने शीघ्र ही पलामू को विपन्न (गरीबी) अवस्था से उबार कर समृद्धि के शिखर तक ले जाने बड़ा योगदान रहा है। ऐसा प्रतीत होता है की उसके अधीन पलामू की सुधरी हुई दशा को ध्यान में रखकर मुगलों ने पलामू को उसके अधीन रहने दिया, आज भी पलामूवासी मेदिनी राय के शासनकाल को चेरो शासन का स्वर्ण युग के रूप में याद करते है। उसने कृषि को को प्रोत्साहित किया और मुगलों के निरंतर आक्रमण से अक्रांत पलामू की दशा को सुधरने का सराहनीय प्रयास किया पलामू अत्यंत समृद्ध हुआ और प्रजा को सुख सुविधा की कोई कमी नहीं होती थी। 

कहा जाता है की मेदिनी राय अपने शासनकाल के दौरान वेश बदलकर राज्य में अकसर घुमा करते थे, और प्रजा के सुख दुःख, समस्या आदि की सारी जानकारी लेता, और उसे बाद में ठीक भी करता था। संभवत: अपनी प्रजा से अपने शासनकाल के दौरान कभी किसी तरह का कर नहीं वसूला, वह अपने प्रजा से बच्चों की तरह प्यार करता था उसके दयालु स्वभाव और अच्छे शासन व्यवस्था के लिए आज भी पलामू में अनेक कहानियां प्रचलित है। मेदिनी राय के गद्दी पर पुन: अधिकार कर लेने के बाद भी औरंगजेब ने इस क्षेत्र में रूचि लेना बंद नहीं किया, पलामू पर मुगलों की नाममात्र की ही सही लेकिन उसकी प्रभुता बन रही।

सन् 1661 ईस्वी में औरंगजेब ने अनिरुद्ध राय को पलामू की थानेदारी के बदले में उटारी नाम का गाँव दे दिय, सन् 1666 ईस्वी में अनिरुध राय के मृत्यु के पश्चात् उसके बेटे निहार देव को नया सनद (अधिकार पत्र) दिया गया। सन् 1674 ईस्वी में मेदिनी राय की मृत्यु हो गई, और उसके राज्य के उतराधिकारी रूद्र राय था जिसने सन् 1674 ईस्वी से 1680 ईस्वी तक शासन किया। रूद्र राय के पश्चात् उसके उतराधिकारी दिकपाल राय बने जो सन् 1697 ईस्वी तक शासन किया, उसके बाद साहेब राय राजा बने जिसका शासन सन् 1716 ईस्वी तक चला औरंगजेब की मृत्यु के समय पलामू की यही स्थिति थी। 

परवर्ती मुगलों के शासन काल में भी चेर के राजाओ के साथ उनका संघर्ष चलता रहा, बंगाल के सूबेदार के रूप में जब अलीवर्दी खां ने छोटानागपुर के विरुद्ध सैनिक अभियान किया तो उस समय राजा जय कृष्ण राय था।

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